
लेबनान. इजरायल और लेबनान के बीच जारी ताजा संघर्ष ने बेहद भयावह रूप ले लिया है। दक्षिण लेबनान में इजरायली सेना द्वारा किए गए हालिया हमले में 17 लोगों की जान चली गई है, जिसे सीजफायर (युद्धविराम) के प्रयासों के बीच अब तक का सबसे घातक हमला माना जा रहा है। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, केवल गुरुवार से अब तक मरने वालों की संख्या 110 हो गई है, जबकि 2 मार्च 2026 से जारी इस लड़ाई में अब तक कुल 2600 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच छिड़ी 'आरोप-प्रत्यारोप' की जंग युद्ध के मैदान के साथ-साथ कूटनीतिक मोर्चे पर भी तनाव चरम पर है। इजरायल का दावा है कि इसी अवधि के दौरान उसके 17 सैनिक भी मारे गए हैं। इजरायल ने हिजबुल्लाह पर सैकड़ों रॉकेट और ड्रोन दागने का आरोप लगाते हुए कहा है कि समझौता उसे हमलों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार देता है। दूसरी ओर, लेबनानी अधिकारियों ने इन दावों को खारिज करते हुए इजरायल पर बार-बार सीजफायर के उल्लंघन का आरोप लगाया है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हिजबुल्लाह की बढ़ती 'ड्रोन क्षमता' को एक बड़ा खतरा बताते हुए स्वीकार किया है कि इससे निपटने में अभी और वक्त लगेगा।
कूटनीति विफल: हिजबुल्लाह ने बातचीत को किया खारिज अमेरिका में राजदूत-स्तरीय बातचीत के बावजूद जमीन पर कोई ठोस परिणाम नजर नहीं आ रहे हैं। लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन ने किसी भी अग्रिम वार्ता से पहले युद्धविराम को पूर्ण रूप से लागू करने की अपील की है। हालांकि, हिजबुल्लाह के नेता नईम कासिम ने सोमवार को अपने संबोधन में कूटनीतिक प्रक्रिया को सिरे से खारिज कर दिया। कासिम ने कहा कि बिना परिणाम की सीधी बातचीत केवल इजरायल और नेतन्याहू के हितों की पूर्ति करती है, ताकि वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पक्ष में एक 'प्रतीकात्मक जीत' की छवि पेश कर सकें।
'हमले जारी रखेंगे': हिजबुल्लाह का आक्रामक रुख शुक्रवार को हिजबुल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि वह इजरायल पर अपने हमले बंद नहीं करेगा। संगठन ने दावा किया है कि उसने दक्षिण लेबनान के सीमावर्ती कस्बों, विशेषकर बिंत जबील और हुला गांव में इजरायली सैनिकों और सैन्य वाहनों के जमावड़े को तोपखाने और ड्रोन से निशाना बनाया है। बियादा क्षेत्र में भी इजरायली सैनिकों पर ड्रोन हमले की खबर है। दोनों पक्षों के अड़ियल रुख के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा युद्ध रोकने के तमाम प्रयास अब तक बेअसर साबित हो रहे हैं, जिससे क्षेत्र में मानवीय संकट और गहराने की आशंका बढ़ गई है।
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