नागोया, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय भाला फेंक खिलाड़ी रिंकू हुड्डा ने सोमवार को नागोया में एशियाई पैरा गेम्स में पुरुषों की एफ46 स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता। हरियाणा के 27 वर्षीय खिलाड़ी ने अपने आखिरी प्रयास में 65.11 मीटर भाला फेंककर हमवतन अजीत सिंह को महज नौ सेंटीमीटर से पीछे छोड़ दिया। हालांकि, इस शानदार जीत के पीछे रिंकू के जीवन का गहरा भावनात्मक दर्द छिपा है। मां के निधन और कंधे की चोट से जूझते हुए उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की।
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नागोया, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय भाला फेंक खिलाड़ी रिंकू हुड्डा ने सोमवार को नागोया में एशियाई पैरा गेम्स में पुरुषों की एफ46 स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता। हरियाणा के 27 वर्षीय खिलाड़ी ने अपने आखिरी प्रयास में 65.11 मीटर भाला फेंककर हमवतन अजीत सिंह को महज नौ सेंटीमीटर से पीछे छोड़ दिया। हालांकि, इस शानदार जीत के पीछे रिंकू के जीवन का गहरा भावनात्मक दर्द छिपा है। मां के निधन और कंधे की चोट से जूझते हुए उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की।
रिंकू की मां का निधन 8 अगस्त को हुआ था। इसके बाद से वह लगातार भावनात्मक संघर्ष से गुजर रहे हैं। उन्होंने आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत में अपनी मां को खोने का दर्द साझा करते हुए बताया कि इस घटना के बाद ऐसा कोई दिन नहीं बीता, जब उनकी आंखों में आंसू न आए हों।
रिंकू हुड्डा ने कहा, “ऐसा कोई दिन नहीं रहा, जब मैं रोया न होऊं। सुबह से शाम तक। हर बार, मैं दिन में एक या दो बार रोता हूं। मुझे उनकी याद आती है। लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे साथ ऐसा होगा।”
उन्होंने बताया कि मां के निधन का उन पर गहरा असर पड़ा है और इसके कारण प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करना भी मुश्किल हो गया है। वह लगातार प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहे हैं और पदक भी जीत रहे हैं, लेकिन अंदर से उन्हें पहले जैसा महसूस नहीं होता।
रिंकू ने कहा, “सच कहूं तो आप प्रशिक्षण नहीं कर सकते। मैं सच बता रहा हूं। बाहर से कोई कुछ भी कह सकता है। लेकिन अगर आप परिवार से जुड़े इंसान हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि जो हुआ, वह ठीक है। अंदर से दिल इसे स्वीकार नहीं करता। मैं अब भी पदक जीतता हूं, लेकिन मुझे ऐसा महसूस नहीं होता कि मैंने कोई पदक जीता है। मां के निधन के बाद से मैं अंदर से ऐसा ही महसूस कर रहा हूं। ऐसा कोई दिन नहीं रहा, जब मैं रोया न होऊं। सुबह से शाम तक। मैं दिन में एक या दो बार रोता हूं। मुझे उनकी याद आती है। लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे साथ ऐसा होगा।”
अपनी मां के निधन से पहले के घटनाक्रम को याद करते हुए रिंकू ने बताया कि उनकी मां दोपहर 3:10 बजे तक उनके हाथ पर सिर रखकर सो रही थीं। इसके बाद वह डोपिंग टेस्ट के लिए नमूना देने कुछ देर के लिए दूसरे घर गए थे। वे उन दस मिनटों को आज भी नहीं भूल पाए हैं।
उन्होंने कहा, “हर किसी को एक दिन जाना है। मुझे भी एक दिन जाना है। सभी को जाना है। लेकिन ऐसा लगता है कि जब खुशी देखने का समय आता है, तभी वह इंसान आपको छोड़कर चला जाता है। जिस दिन मेरी मां का निधन हुआ, वह दोपहर 3:10 बजे तक मेरे हाथ पर सिर रखकर सो रही थीं। जब मैं सोने गया, तो मेरा भाई अनुज आया। उसने मुझसे कहा कि तुम सो जाओ, मैं उनका ध्यान रखूंगा। मां को लगातार ऑक्सीजन दी जा रही थी।”
उन्होंने आगे बताया, “जैसे ही मैं सोया, डोपिंग टीम मेरा नमूना लेने आ गई। मैंने मां से कहा कि नमूना देकर 10 मिनट में वापस आ जाऊंगा। मैं बगल वाले घर में गया, जो हमारा दूसरा घर है। जीवनभर मुझे वे 10 मिनट याद रहेंगे। उस समय मुझे जो सदमा लगा था, वह आज भी महसूस होता है।”
मां को खोने के बाद रिंकू के लिए दोबारा खेल की दिनचर्या में लौटना आसान नहीं था। उन्होंने 19 अगस्त से प्रशिक्षण शुरू किया, लेकिन मन नहीं लगने के कारण उन्हें काफी परेशानी हुई। उनके पिता ने उन्हें अपने खेल और भविष्य पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया।
रिंकू ने बताया कि वह पिछले ढाई महीने से मानसिक परेशानी से गुजर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने प्रशिक्षण शुरू किया, तो उनका मन अभ्यास करने का नहीं होता था। उनके पिता ने उन्हें समझाया कि जो हो गया, उसे बदला नहीं जा सकता और अब उन्हें अपने ऊपर ध्यान देना चाहिए।
रिंकू ने कहा, “जब मैंने प्रशिक्षण शुरू किया, तो अगले ही सत्र में मेरे कंधे में दर्द होने लगा। इसके बाद मैंने एमआरआई कराई। उसमें पता चला कि ग्रेड-1 का टियर है। चोट से उबरने के लिए हमारे पास अभी काफी समय था। इसलिए मेरे डॉक्टर स्वप्निल, मेरे स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच लक्ष्य और मैं एक साथ बैठे। हमने दो-तीन घंटे तक चर्चा की कि आगे क्या करना चाहिए।”
उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके चार-पांच प्रशिक्षण सत्र छूट गए। इसके बाद जब उन्होंने दोबारा अभ्यास शुरू किया, तो कंधे पर टेपिंग करके प्रशिक्षण लिया। प्रतियोगिता से ठीक पहले भी उन्हें इसी प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ा, क्योंकि टीम कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी।
रिंकू ने कहा, “चोट लगने से पहले, 8 अगस्त को मेरी मां के निधन से पहले भी हमारा एक सत्र हुआ था। उसके बाद भी हमने अभ्यास किया था और सामान्य रूप से 61 से 62 मीटर तक भाला फेंका था। लेकिन जब कंधे में दर्द हुआ, तो हमें नहीं लगा था कि भाला 64 या 65 मीटर तक जा पाएगा। हमारे तीन-चार सत्र छूट गए। अभ्यास से पहले मेरे कंधे पर टेपिंग की गई और हमने प्रशिक्षण किया। एशियाई खेलों से पहले शुक्रवार, 9 तारीख को हमने अपने मैदान पर पूरी ताकत से भाला फेंकने का सत्र किया, जिसमें 61 से 62 मीटर तक के प्रयास रहे।”
कंधे की चोट को लेकर अनिश्चितता के बावजूद रिंकू ने प्रतियोगिता में उतरने से पहले अच्छी शुरुआत करने की योजना बनाई थी। उन्हें आशंका थी कि कंधे की स्थिति के कारण वह सभी छह प्रयास नहीं कर पाएंगे। इसलिए उनकी कोशिश शुरुआती दो प्रयासों में ही अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की थी।
उन्होंने कहा, “मैं पहले ही प्रयास में अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहता था। मेरी चोट पूरी तरह ठीक हो गई थी, इसलिए मैं शुरुआती दो प्रयासों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहता था। हमने पहले ही योजना बना ली थी कि अगर हमें अच्छा प्रदर्शन करना है, तो पहले या दूसरे प्रयास में ही करना होगा, क्योंकि हमें नहीं पता था कि हम छठे प्रयास तक पहुंच पाएंगे या नहीं। यही हमारी योजना थी।”
रिंकू ने बताया कि भाला फेंकने से पहले उन्होंने अजीत सिंह से ज्यादा बातचीत नहीं की थी। मैदान पर दोनों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया और प्रतियोगिता के लिए तैयार हुए। मुकाबला बेहद करीबी रहा। अजीत सिंह ने अपने चौथे प्रयास में 65.02 मीटर भाला फेंककर बढ़त हासिल की। इसके बाद रिंकू को स्वर्ण पदक जीतने के लिए इससे बेहतर प्रदर्शन करना था। हरियाणा के इस खिलाड़ी ने आखिरी प्रयास में 65.11 मीटर का थ्रो किया और महज नौ सेंटीमीटर के अंतर से स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। इंडोनेशिया के आर. सक्त्योनो ने 55.30 मीटर के प्रदर्शन के साथ कांस्य पदक जीता।
रिंकू ने कहा कि उन्होंने आखिरी समय तक स्वर्ण पदक जीतने की उम्मीद नहीं छोड़ी थी। उन्होंने बताया कि बड़े टूर्नामेंटों में अक्सर उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन आखिरी प्रयास में ही आता है।
उन्होंने कहा, “नहीं, मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी। मैं कभी उम्मीद नहीं छोड़ता। मैं हमेशा आखिरी प्रयास में अपनी पूरी ऊर्जा लगाने की कोशिश करता हूं। मैंने पिछले एशियाई खेलों में भी ऐसा ही किया था। 2022 के एशियाई खेलों में मैंने आखिरी प्रयास में 67 मीटर भाला फेंका था। पेरिस में विश्व चैंपियनशिप में भी ऐसा ही हुआ था। मुझे नहीं पता कि मेरा शरीर गर्म होने में समय लेता है या इसकी कोई और वजह है, लेकिन ज्यादातर प्रतियोगिताओं में मेरे सर्वश्रेष्ठ थ्रो आखिरी प्रयास में आते हैं।”
रिंकू ने पैरा खेलों में नए और जूनियर खिलाड़ियों को अधिक वित्तीय सहायता और संस्थागत सहयोग देने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ खिलाड़ियों के पास प्रायोजन, नौकरी और अन्य सुविधाओं के रूप में एक सुरक्षा व्यवस्था होती है, लेकिन पहली बार प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों को अधिक सहयोग की जरूरत है।
उन्होंने कहा, “वरिष्ठ खिलाड़ियों के पास प्रायोजन और नौकरियां हैं। हर तरह से उनके पास एक बैकअप होता है। लेकिन जो जूनियर खिलाड़ी पहली बार खेल रहे हैं, उन्हें अधिक सहयोग की जरूरत है। उन्हें ज्यादा प्रायोजन और टॉप्स (टीओपीएस) से मदद मिलनी चाहिए। महासंघ हमेशा उनका समर्थन करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन हमारे नए जूनियर खिलाड़ियों को अधिक सहायता दी जानी चाहिए।”
एशियाई पैरा गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने के बाद रिंकू ने एक-दो महीने आराम करने की योजना बनाई है। फिलहाल उन्होंने अपने प्रदर्शन को लेकर कोई तत्काल लक्ष्य तय नहीं किया है। उनका मुख्य ध्यान लॉस एंजिल्स 2028 ओलंपिक और पैरालंपिक चक्र पर है।
रिंकू ने कहा, “अभी कोई खास लक्ष्य नहीं है। हम एक-दो महीने आराम करेंगे। हमारा मुख्य ध्यान एक चीज पर है, जिसे हम हासिल करना चाहते हैं और वह है ओलंपिक। हम हर प्रतियोगिता में उसी तरह खेलना चाहते हैं, जैसा हमने इस खेल में किया। लेकिन हमारी योजना हमेशा लॉस एंजिल्स 2028 ओलंपिक पर केंद्रित रहेगी। हम इसे हासिल कर पाएं या नहीं, यही हमारा मुख्य लक्ष्य रहेगा।”
--आईएएनएस
डीएससी
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