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अमेरिका-ईरान तनाव में पाकिस्तान की कूटनीति पर उठे सवाल, बीजिंग के हितों से जुड़ी है उसकी मध्यस्थता


तेल अवीव, 26 मई (आईएएनएस)। पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, लेकिन वह इसे किसी तटस्थ स्थिति से नहीं, बल्कि चीन के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र के भीतर रहकर निभा रहा है।

तेल अवीव, 26 मई (आईएएनएस)। पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, लेकिन वह इसे किसी तटस्थ स्थिति से नहीं, बल्कि चीन के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र के भीतर रहकर निभा रहा है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, भले ही इस्लामाबाद खुद को वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा हो, लेकिन उसकी इस भूमिका के पीछे चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव की छाया मौजूद है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की यह कूटनीतिक सक्रियता हिंद-प्रशांत और पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में उसके बढ़ते महत्व को दर्शाती है, लेकिन साथ ही यह भी संकेत देती है कि उसकी विदेश नीति कई स्तरों पर बड़े शक्तिकेंद्रों, खासकर चीन से प्रभावित है।

‘टाइम्स ऑफ इजरायल’ के लिए लिखने वाले इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने कहा कि पाकिस्तान खुद को पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव में एक संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। उनके मुताबिक, इस्लामाबाद चाहता है कि उसे वाशिंगटन के लिए उपयोगी, तेहरान के लिए भरोसेमंद, खाड़ी देशों के लिए स्वीकार्य और व्यापक मुस्लिम दुनिया के लिए जिम्मेदार खिलाड़ी के तौर पर देखा जाए।

हालांकि, उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों को उसके ऐतिहासिक और रणनीतिक रिकॉर्ड के संदर्भ में भी समझना चाहिए। उन्होंने खास तौर पर काराकोरम क्षेत्र और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की शक्सगाम घाटी का उल्लेख किया, जिसे पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया था।

विशेषज्ञ ने कहा कि पाकिस्तान की मौजूदा नीति तटस्थता से नहीं, बल्कि अपने रणनीतिक अस्तित्व के लिए चीन पर बढ़ती निर्भरता से प्रेरित है।

रेस्टेली ने कहा, “चीन और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर इस्लामाबाद ने एक बार फिर अपने पुराने रणनीतिक संबंधों को भावनात्मक नारों में पेश किया है। ‘हर मौसम का दोस्त’, ‘आयरन ब्रदरहुड’, ‘हिमालय से ऊंचा’ और ‘समुद्र से गहरा’ जैसी बातें सुनने में भावुक और लगभग काव्यात्मक लगती हैं, लेकिन इन नारों के पीछे एक कड़वी हकीकत छिपी है। पाकिस्तान की चीन के प्रति निष्ठा इसलिए मजबूत होती जा रही है क्योंकि उसका रणनीतिक अस्तित्व तेजी से बीजिंग पर निर्भर होता जा रहा है।”

उन्होंने आगे कहा, “आज यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि पाकिस्तान खुद को अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच झगड़े में एक ब्रोकर के तौर पर पेश कर रहा है। इस्लामाबाद वाशिंगटन के लिए उपयोगी, तेहरान के लिए भरोसेमंद, खाड़ी देशों के लिए स्वीकार्य और बड़ी मुस्लिम दुनिया के सामने जिम्मेदार दिखना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान की कोई भी मध्यस्थता आखिरकार निष्पक्षता के भ्रम से ज्यादा बीजिंग के हितों को दिखाएगी।”

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई), 2026 के डाटा का हवाला देते हुए रेस्टेली ने कहा कि 2021 और 2025 के बीच पाकिस्तान के हथियारों के इंपोर्ट में 66 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जिसमें चीन का हिस्सा कुल 80 फीसदी था।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इसे विविधीकरण नहीं, बल्कि निर्भरता कहा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, कोई ऐसा देश जिसकी सैन्य क्षमता, एयर डिफेंस, लड़ाकू विमान, नौसैनिक सिस्टम और रणनीतिक आत्मविश्वास तेजी से एक ही सप्लायर पर आधारित हो, वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसके भू-राजनीतिक फैसले पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

रेस्टेली के अनुसार, चीन की प्राथमिक चिंता ईरान की जीत, पाकिस्तान की प्रतिष्ठा या अमेरिका-विरोधी राजनीति नहीं है। उनका कहना है कि बीजिंग का असली मकसद ऐसी स्थिरता बनाए रखना है, जिससे उसकी ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रहे, अमेरिका के प्रभाव को संतुलित किया जा सके, तेहरान के साथ संबंध कायम रहें और कोई क्षेत्रीय युद्ध चीनी व्यापार और सप्लाई चेन को प्रभावित न करे।

उन्होंने एक भरोसेमंद मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, “पाकिस्तान की मध्यस्थता चीन को एक काम का जरिया देती है। इस्लामाबाद वहां बोल सकता है जहां बीजिंग ज्यादा खुलकर खड़ा नहीं होना चाहता। पाकिस्तान मैसेज पहुंचा सकता है, प्रस्ताव टेस्ट कर सकता है, ईरान को भरोसा दिला सकता है, वाशिंगटन से जुड़ सकता है और खाड़ी देशों को संकेत दे सकता है, जबकि चीन बैकग्राउंड में बड़ी ताकत बना रहेगा।”

--आईएएनएस

केके/वीसी

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