
नई दिल्ली। देश में बच्चों को गोद लेने (Adoption) की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह बनाने के लिए केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) ने नए और कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन आने वाली इस संस्था ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट किया है कि बच्चों के अधिकारों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
नए नियमों के अनुसार, किसी भी बच्चे को गोद लेने की सूची में डालने से पहले उसकी गहन जांच अनिवार्य होगी।
लावारिस बच्चे: यदि कोई बच्चा लावारिस मिलता है, तो सबसे पहले प्रशासन उसके जैविक माता-पिता की तलाश के लिए हर संभव प्रयास करेगा।
पुनर्विचार का समय: यदि माता-पिता स्वेच्छा से बच्चा संस्था को सौंपते हैं, तो उन्हें 2 महीने का 'कूलिंग-ऑफ' समय दिया जाएगा, ताकि वे भावनाओं में बहकर लिए गए फैसले पर दोबारा विचार कर सकें। इन सभी प्रयासों के विफल होने के बाद ही बच्चे को 'कानूनी रूप से स्वतंत्र' (Legally Free) घोषित किया जाएगा।
अक्सर देखा गया है कि गोद लेने वाली संस्थाएं बंद होने पर बच्चों के रिकॉर्ड नष्ट हो जाते हैं, जिससे बड़े होने पर उन्हें अपनी जड़ों को ढूंढने में परेशानी होती है। अब CARA ने निर्देश दिया है:
सभी भौतिक (Physical) और डिजिटल रिकॉर्ड्स को सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा।
संस्था बंद होने की स्थिति में सारा डेटा सरकार द्वारा नामित एजेंसी को सौंपना होगा।
बिना अनुमति के किसी भी रिकॉर्ड को नष्ट करना अपराध माना जाएगा।
नए नियमों में बच्चों की गोपनीयता (Privacy) को लेकर सबसे सख्त प्रावधान किए गए हैं। अब अनाथालयों या गोद लेने वाली एजेंसियों में रहने वाले बच्चों की फोटो या वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। यदि कोई अधिकारी या संस्थान बच्चे की पहचान सार्वजनिक करता है, तो उसके खिलाफ सीधी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इन कड़े निर्देशों का मुख्य उद्देश्य 'किशोर न्याय अधिनियम 2015' को धरातल पर कड़ाई से लागू करना है। सरकार का लक्ष्य गोद लेने की प्रक्रिया से बिचौलियों को खत्म करना और बच्चों की तस्करी जैसी गंभीर समस्याओं पर पूरी तरह लगाम लगाना है।
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