
जबलपुर. उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति राजेश बिंदल एवं न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की युगलपीठ ने जबलपुर के तीन दशक पुराने भूमि विवाद का पटाक्षेप कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट किया कि पैतृक संपत्ति केवल वही है जो पिता, दादा या परदादा से विरासत में मिली हो। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि नानी से प्राप्त संपत्ति पर नाती-पोतों का कोई जन्मजात अधिकार नहीं होता, इसलिए पिता ऐसी संपत्ति को बेचने या किसी को भी हस्तांतरित करने के लिए स्वतंत्र है।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व के आदेश को बरकरार रखते हुए जबलपुर निवासी रश्मि अवस्थी की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं मिला है। यह मामला वर्ष 1995 में शुरू हुआ था, जब दीक्षितपुरा निवासी योगेश कुमार अवस्थी ने आधारताल के रेंगवा स्थित दो एकड़ बेशकीमती जमीन का सौदा सुभाष चंद्र केसरवानी के साथ किया था, लेकिन बाद में वे मुकर गए थे।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जब यह मामला कोर्ट में लंबित था और पिता योगेश अवस्थी की मृत्यु हुई, तब उनकी बेटी रश्मि ने अपनी मां गीता और भाई राजेश के साथ मिलकर विवादित जमीन के तीन हिस्से गुपचुप तरीके से अन्य खरीदारों (मेसर्स बालाजी गोल्डन टाउन, शकुन राय और शाहिदा नाज) को बेच दिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे वास्तविक खरीदार सुभाष चंद्र केसरवानी को उसके कानूनी हक से वंचित करने की एक दुर्भावनापूर्ण और चालाकी भरी कोशिश करार दिया।
यह कानूनी लड़ाई निचली अदालत से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँची, जहाँ हर स्तर पर फैसला खरीदार केसरवानी के पक्ष में आया। जब जमीन पर कब्जा दिलाने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब रश्मि अवस्थी ने कानूनी अड़चनें पैदा करने का प्रयास किया था, जिसे अब देश की शीर्ष अदालत ने पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इस फैसले से न केवल 30 साल पुराने विवाद का अंत हुआ है, बल्कि संपत्ति उत्तराधिकार के मामलों में 'नानी की संपत्ति' की स्थिति भी कानूनी रूप से स्पष्ट हो गई है।
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