
पन्ना/छतरपुर। केन-बेतवा लिंक परियोजना, मझगाय बांध, रुँझ बांध, ललितपुर सिंगरौली रेल मार्ग प्रभावित विस्थापितों का चिता आंदोलन सातवें दिन भी जारी रहा। मुआवजा, पुनर्वास और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच सागर संभाग के कमिश्नर के कथित विवादित बयान ने विस्थापितों के आक्रोश को और भड़का दिया है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रशासन ने सामाजिक आकलन और ग्राम सभा और पारदर्शी सर्वे के बिना परियोजना प्रभावितों को तरह तरह से प्रताड़ित किया है, परियोजनाएं विकास की प्रतीक से ज्यादा अधिकारियों के निजी विकास करती दिख रही है। अब स्थिति यह है कि कई परिवारों को मुआवजा मिले बिना ही उनके घरों और गांवों में पानी लगातार बढ़ रहा है।

मुख्यमंत्री द्वारा अतिरिक्त सहायता के रूप में 12.50 लाख देने की घोषणा को दो माह बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक किसी भी प्रभावित परिवार को पूरी 12.30 लाख की राशि नहीं मिली है। कई परिवारों को तो 8 साल पहले घोषित राशि 5 लाख ही प्राप्त हुए हैं, जबकि अनेक परिवार अभी भी 5 लाख से भी वंचित हैं। गांव डूब रहे फिर भी मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी प्रशासन ने इसकी प्रक्रिया समय पर शुरू नहीं की और आंदोलन के दबाव के बाद ही प्रक्रिया प्रारंभ की गई।

जय किसान संगठन के नेता और आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अमित भटनागर ने कहा कि विस्थापितों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रशासन आंदोलनकारियों को अलग-अलग तरीके से प्रताड़ित कर रहा है। प्रभावित क्षेत्रों में बिजली, पानी काटे जाने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि मुआवजा और पुनर्वास देने के बजाय लोगों के घरों की बिजली काटना लोकतांत्रिक आवाज को दबाने जैसा है।
उन्होंने कहा कि हाल ही में प्रभावित आदिवासी महिला रमिया आदिवासी की मौत के मामले में भी प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी पर सवाल उठे हैं। प्रशासन ने उन्हें दी गई राशि का उल्लेख किया, जबकि परिवार का कहना है कि इससे कहीं अधिक राशि अभी बकाया थी। आंदोलनकारियों के अनुसार लगभग 75 लाख की राशि बकाया थी। इस घटना ने विस्थापन प्रक्रिया में मुआवजे और पुनर्वास की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

आंदोलनकारियों के अनुसार सागर संभाग के कमिश्नर द्वारा यह कथित बयान दिया गया कि कुंवरपुर के विस्थापित वहां मौजूद ही नहीं हैं और वहां कोई विस्थापित नहीं है।
अमित भटनागर ने कहा कि यह बयान जमीनी वास्तविकता के बिल्कुल विपरीत है। उनके अनुसार पूरी परियोजना में बड़ी संख्या में प्रभावित परिवार कुंवरपुर क्षेत्र के हैं। उन्होंने कहा कि स्वयं प्रशासन की टीम जब आंदोलन स्थल पर पहुंची थी तो उसने 150 से अधिक प्रभावित लोगों के नाम दर्ज किए थे, जबकि उस समय भी कई लोग छूट गए थे।
आंदोलनकारियों का कहना है कि जब प्रशासन की अपनी टीम सैकड़ों प्रभावित लोगों के नाम दर्ज कर चुकी है, तब विस्थापितों के अस्तित्व से ही इनकार करने वाला बयान स्वाभाविक रूप से लोगों के आक्रोश को बढ़ाने वाला है।

आंदोलनकारियों के अनुसार पिछले दिनों जहां चिता आंदोलन में प्रतिदिन लगभग 400–500 लोग शामिल हो रहे थे, वहीं कमिश्नर के कथित बयान के बाद आज आंदोलन स्थल पर लोगों की संख्या बढ़कर लगभग 1200–1300 तक पहुंच गई।
बढ़ते जनसमर्थन के बीच आंदोलनकारियों ने निर्णय लिया है कि अब आंदोलन रात में भी जारी रहेगा। खबर लिखे जाने तक सैकड़ों लोग बांध स्थल पर डटे हुए थे और प्रशासन की कथित संवेदनहीनता के खिलाफ मशाल जुलूस की तैयारी की जा रही थी।
अमित भटनागर ने कहा—“प्रशासन अपना सिस्टम सुधार नहीं पा रहा है। भ्रष्टाचार और अधिकारियों की मनमानी के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। लोग न्याय के लिए भटक रहे हैं और जब प्रशासन उन्हें न्याय नहीं दे पा रहा, तब इस तरह के बयान सामने आ रहे हैं। यह प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।”उन्होंने कहा कि चिता आंदोलन किसी व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ नहीं, बल्कि विस्थापितों को न्याय, सम्मानजनक पुनर्वास और उनके संवैधानिक अधिकारों के लिए है।
उन्होंने कहा कि जिन लोगों के घर डूब रहे हैं, जिनका मुआवजा लंबित है और जिनके पुनर्वास की व्यवस्था नहीं हुई है, उनके सवालों का जवाब देने के बजाय यदि प्रशासन उनके अस्तित्व पर ही सवाल उठाएगा तो इससे आंदोलन और व्यापक होगा।
अमित भटनागर ने कहा कि आंदोलनकारी शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें उठा रहे हैं तथा जब तक प्रभावित परिवारों को न्याय, पूर्ण मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक चिता आंदोलन जारी रहेगा।
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