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दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल और आप के अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​की कार्रवाई शुरू की


नई दिल्ली, 14 मई (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के कई अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू की। कोर्ट ने माना कि आबकारी नीति मामले से जुड़ी कार्यवाही के संबंध में न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए एक सुनियोजित अभियान चलाया गया था।

नई दिल्ली, 14 मई (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के कई अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू की। कोर्ट ने माना कि आबकारी नीति मामले से जुड़ी कार्यवाही के संबंध में न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए एक सुनियोजित अभियान चलाया गया था।

जस्टिस स्वरना कांता शर्मा ने एक विस्तृत आदेश जारी करते हुए कहा कि जब उन्होंने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार कर दिया, तो उनके खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और सार्वजनिक बयान दिए गए, जो निष्पक्ष आलोचना और आपराधिक अवमानना ​​के बीच की सीमा को पार कर गए। जस्टिस शर्मा ने कहा कि अवमानना ​​करने वालों ने न केवल असहमति व्यक्त की, बल्कि इस मौजूदा जज के खिलाफ ही नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका के खिलाफ बदनामी का अभियान चलाया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल, दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, सांसद संजय सिंह और आप नेता सौरभ भारद्वाज, विनय मिश्रा और दुर्गेश पाठक के खिलाफ अवमानना ​​नोटिस जारी किए।

जस्टिस शर्मा ने कहा कि हालांकि जजों को निष्पक्ष आलोचना और असहमति स्वीकार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। चुप रहना न्यायिक संयम नहीं है, जब न्यायपालिका को बदनाम करने का एक सोची-समझी कोशिश की जाती है।

जज ने कहा कि यह अदालत सहानुभूति या आलोचना से छूट की मांग नहीं कर रही है। लेकिन अगर सुनियोजित अभियानों के माध्यम से न्यायपालिका की संस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिशें की जाती हैं, तो अदालत के पास कार्रवाई करने की शक्ति और कर्तव्य है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेशों की आलोचना करना तो जायज है, लेकिन निष्पक्ष आलोचना और 'कोर्ट की अवमानना' के बीच एक बहुत ही बारीक लकीर होती है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी आम नागरिक किसी भी जज या आदेश की आलोचना कर सकता है। इसे अवमानना ​​नहीं माना जाता। लेकिन, निष्पक्ष आलोचना और किसी जज को पक्षपाती दिखाने के लिए एक मुहिम चलाने में फर्क होता है।

जस्टिस शर्मा ने कहा कि केजरीवाल ने खुद को केस से अलग रखने की अर्जी खारिज होने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के बजाय, इस मामले को सोशल मीडिया पर ले जाने का रास्ता चुना। उन्होंने चिट्ठियां और वीडियो जारी करके जस्टिस की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।

जज ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट जा सकते थे। इसके बजाय, उन्होंने सार्वजनिक रूप से चिट्ठियां और वीडियो फैलाए, जिनमें राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया गया था और यह संकेत दिया गया था कि इस अदालत से न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती। दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार, यह रवैया न्यायपालिका के प्रति जनता में अविश्वास पैदा करने की एक कोशिश थी और अगर इसे न रोका गया, तो इससे अराजकता फैल जाएगी।

जस्टिस शर्मा ने आगे कहा कि उनके परिवार के सदस्यों को भी इस विवाद में घसीटा गया। यह एक मनोवैज्ञानिक दबाव अभियान का हिस्सा था, जिसका मकसद उन पर दबाव डालकर उन्हें इस केस से खुद को अलग करने के लिए मजबूर करना था। जस्टिस शर्मा ने कहा कि मैं किसी से डरने वाली नहीं हूं। चुप रहना हार मान लेने जैसा होता। उन्होंने साफ किया कि अवमानना ​​की यह कार्यवाही किसी निजी गुस्से या शिकायत की वजह से नहीं, बल्कि न्यायपालिका जैसी संस्था की रक्षा करने के उद्देश्य से की गई थी। जज आते-जाते रहेंगे, लेकिन न्याय की संस्था हमेशा बनी रहेगी। भारत की न्यायपालिका हमेशा निडर रहेगी।

अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू होने के मद्देनजर जस्टिस शर्मा ने आबकारी नीति मामले की आगे की सुनवाई से भी खुद को अलग कर लिया और कहा कि हो सकता है कि अगर मैं इस मामले की सुनवाई करती रहूं, तो अरविंद केजरीवाल और दूसरे लोगों को लगे कि मेरे मन में उनके प्रति कोई दुर्भावना है। इसीलिए मैंने सोचा है कि इस खास मामले की सुनवाई कोई दूसरी बेंच करेगी।

इससे पहले दिन में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि वह अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करेगा, क्योंकि आबकारी नीति मामले में सीबीआई की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई कर रहे जज के खिलाफ कथित तौर पर बेहद अपमानजनक और मानहानिकारक सामग्री फैलाई गई थी।

जस्टिस शर्मा ने इससे पहले वरिष्ठ वकीलों को 'एमिकस क्यूरी' के तौर पर नियुक्त करने पर विचार किया था, जब केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक ने अपनी अलग होने की अर्जियां खारिज होने के बाद कार्यवाही से खुद को अलग रखने का फैसला किया था।

ट्रायल कोर्ट ने 1,100 से ज्यादा पैराग्राफ वाले अपने फैसले में केजरीवाल और सिसोदिया समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से पता चलता है कि अब रद्द हो चुकी आबकारी नीति एक सलाह-मशविरे और सोच-विचार वाली प्रक्रिया का नतीजा थी और अभियोजन पक्ष कोई बड़ी साजिश साबित करने में नाकाम रहा।

दिल्ली हाई कोर्ट में अपनी पुनर्विचार याचिका में सीबीआई ने आरोप लगाया है कि उस समय की आप नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार द्वारा बनाई गई आबकारी नीति में कुछ चुनिंदा शराब व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए हेर-फेर किया गया था, जिसके बदले में उन्हें रिश्वत मिली थी।

9 मार्च को जस्टिस शर्मा ने सीबीआई की उस याचिका पर नोटिस जारी किया था जिसमें बरी करने के आदेश को चुनौती दी गई थी। साथ ही, ट्रायल कोर्ट द्वारा जांच एजेंसी और सीबीआई के एक अधिकारी के खिलाफ की गई कड़ी टिप्पणियों पर भी रोक लगा दी थी।

--आईएएनएस

पीएसके

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