Office Address

Address Display Here

Phone Number

+91-9876543210

Email Address

info@deshbandhu.co.in

दिल्ली सरकार ने जज के खिलाफ पोस्ट पर सीजेपी की रत्ना सिंह पर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही को दी मंजूरी


नई दिल्ली, 4 नवंबर (आईएएनएस)। दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील (आपराधिक) अमोल सिन्हा ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दे दी है।

नई दिल्ली, 4 नवंबर (आईएएनएस)। दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील (आपराधिक) अमोल सिन्हा ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दे दी है।

यह मामला साकेत कोर्ट के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट (जुडिशियल मजिस्ट्रेट) के बारे में सोशल मीडिया पर रत्ना सिंह द्वारा की गई टिप्पणियों से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि न्यायिक अधिकारी 'अपने आका की सेवा' कर रहे हैं और किसी बाहरी सत्ता के निर्देशों पर काम कर रहे हैं।

अधिवक्ता कौशिक चटर्जी ने सीजेपी के कानूनी मामलों के प्रमुख के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​(क्रिमिनल कंटेंप्ट) की कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया था।

'एक्स' पर एक पोस्ट में जज के खिलाफ की गई टिप्पणियों को प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना ​​के दायरे में माना गया है। इसलिए, 'कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971' (न्यायालय अवमानना ​​अधिनियम, 1971) की धारा 15(2) के तहत इसके लिए सहमति दे दी गई है।

रत्ना सिंह ने 'एक्स' पर पोस्ट किया था, "जज अपने आका की सेवा कर रहे हैं। पूरी सुनवाई के दौरान वे 4 बार ब्रेक/मीटिंग के लिए गए। बिना किसी कानूनी आधार के आदेश दिया गया।"

एक अन्य पोस्ट में उन्होंने कहा था, "दिल्ली पुलिस अपने आका के आदेश का पालन कर रही है। जज भी अपने आका के आदेश का पालन कर रहे हैं।"

अपने जवाब में, अतिरिक्त स्थायी वकील (क्रिमिनल) सिन्हा ने कहा, "यह बात पूरी तरह से स्थापित है कि न्यायिक आदेशों की आलोचना की जा सकती है, जिसमें उनके तर्क, वैधता और सही होने पर सवाल उठाना शामिल है। कोई व्यक्ति जो किसी न्यायिक फैसले से असंतुष्ट है, वह कानून में उपलब्ध विकल्पों के जरिए उस पर सवाल उठा सकता है और फैसले से अपनी असहमति भी जता सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने 'पी.एन. दुदा बनाम वी.पी. शिव शंकर' (1988) मामले में माना है कि न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष आलोचना की जा सकती है। हालांकि, ऐसी आलोचना को उन बयानों से अलग देखा जाना चाहिए जो अदालत को बदनाम करते हों या उसकी गरिमा को कम करते हों।"

उन्होंने कहा कि "किसी न्यायिक फैसले की शुद्धता पर सवाल उठाने और उस फैसले को देने वाले न्यायिक अधिकारी पर बाहरी दबाव या गलत इरादों का आरोप लगाने के बीच एक स्पष्ट अंतर है।"

उन्होंने स्पष्ट किया कि "यह राय केवल आरोपों की प्रथम दृष्टया प्रकृति तक सीमित है। इसे आपराधिक अवमानना ​​का अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए; इस पर हाईकोर्ट स्वतंत्र रूप से विचार करेगा।"

--आईएएनएस

एससीएच/पीएम

Date & Time : 2026-11-04 18:25:01

Share:

Leave A Reviews

Related News