Office Address

Address Display Here

Phone Number

+91-9876543210

Email Address

info@deshbandhu.co.in

एसईसीसी 2011 का जाति डेटा भरोसेमंद नहीं, कई एंट्रीज में नंबर और सिंबल : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया


नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) 2011 के दौरान इकट्ठा किए गए कच्चे जाति डेटा में कई गलतियां हैं। इनमें ऐसे मामले भी शामिल हैं, जहां डेटा इकट्ठा करने वालों ने जाति के नामों की जगह नंबर या सिंबल दर्ज किए थे, जिससे यह डेटा आरक्षण तय करने या अन्य सरकारी कामों के लिए भरोसेमंद नहीं रह गया है।

नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) 2011 के दौरान इकट्ठा किए गए कच्चे जाति डेटा में कई गलतियां हैं। इनमें ऐसे मामले भी शामिल हैं, जहां डेटा इकट्ठा करने वालों ने जाति के नामों की जगह नंबर या सिंबल दर्ज किए थे, जिससे यह डेटा आरक्षण तय करने या अन्य सरकारी कामों के लिए भरोसेमंद नहीं रह गया है।

महाराष्ट्र सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने की मांग करते हुए एक रिट याचिका दायर की थी। इसके जवाब में सितंबर 2021 में दायर हलफनामे में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने कहा कि 2011 से पहले जातियों की कोई रजिस्ट्री तैयार नहीं की गई थी, जिससे डेटा में विसंगतियां आईं।

केंद्र ने कहा था, "कई सौ मामलों में, जाति के कॉलम में जाति के नामों के सामने नंबर या सिंबल लिखे हुए थे।" यह भी कहा गया कि 2011 की जनगणना से पहले जातियों की कोई रजिस्ट्री तैयार नहीं की गई थी।

हलफनामे में कहा गया, "रजिस्ट्री के लिए यह आदर्श होता कि जातियों के चयन के लिए एक ड्रॉप-डाउन मेनू दिया जाता, जिससे कुछ ऐसा सुसंगत डेटा उपलब्ध हो पाता, जिस पर भरोसा किया जा सके।"

केंद्र ने कहा था कि एसईसीसी-2011 के तहत इकट्ठा किए गए जाति डेटा को कभी भी आधिकारिक नहीं बनाया गया क्योंकि जाति और जनजाति डेटा में 'तकनीकी खामियां' पाई गई थीं, जिससे यह जनसंख्या से संबंधित आधिकारिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल के लायक नहीं रह गया था।

हलफनामे के अनुसार, डेटा में लगभग 130 करोड़ रिकॉर्ड थे और शुरू में इसे हजारों अलग-अलग एमएस एक्सल शीट में रखा गया था। राज्यवार, जिलावार और जातिवार विश्लेषण करने के लिए डेटा को रिलेशनल डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम में ट्रांसफर करना पड़ा।

केंद्र ने कहा था कि महाराष्ट्र के लिए एसईसीसी डेटा के विश्लेषण से पता चला कि लगभग 10.3 करोड़ की कुल आबादी में से 1.17 करोड़ लोग, या 11.12 प्रतिशत, 'बिना जाति' वाले दर्ज किए गए थे, जबकि कुल 4,28,677 जातियां गिनी गई थीं।

इसके विपरीत, हलफनामे में इस बात पर जोर दिया गया कि महाराष्ट्र में अनुसूचित जनजातियों, अनुसूचित जातियों और ओबीसी की मौजूदा प्रकाशित सूचियों में कुल मिलाकर केवल 494 प्रविष्टियां हैं, जिनमें 47 एसटी, 59 एससी और 388 ओबीसी शामिल हैं।

केंद्र ने कहा था कि यह बड़ा अंतर रॉ जाति डेटा की समस्याओं को दर्शाता है। हलफनामे में कहा गया, "ऊपर बताई गई बातों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि एसईसीसी 2011 में जाति की गिनती में गलतियां और अशुद्धियां थीं।"

इसमें यह भी कहा गया कि महाराष्ट्र में गिनी गई 99 प्रतिशत से ज्यादा जातियों की आबादी 100 लोगों से कम थी। केंद्र ने इन अंतरों के कई कारण बताए, जिनमें डेटा इकट्ठा करने वालों द्वारा एक ही जाति की अलग-अलग स्पेलिंग लिखना भी शामिल है। उन्होंने केरल के मालाबार इलाके में 'मापिला' जाति का उदाहरण दिया और कहा कि अलग-अलग लोगों ने इस जाति की स्पेलिंग 40 अलग-अलग तरीकों से लिखी, जिससे 40 अलग-अलग जातियां दर्ज हो गईं।

इसी तरह, हलफनामे में कहा गया कि 'पवार' और 'पोवार' जैसे नामों को बोलने में एक जैसी आवाज के आधार पर एक साथ रखने की जरूरत पड़ सकती है, जबकि सिर्फ 'पोवार' को ही ओबीसी के तौर पर लिस्ट किया गया था।

सरकार ने यह भी बताया कि कई मामलों में परिवारों ने जाति बताने से इनकार कर दिया या डेटा इकट्ठा करने वाला व्यक्ति उसे पता नहीं लगा सका, जिसके कारण जाति वाले कॉलम में 'एक्स' जैसी एंट्रीज की गईं।

इसमें कहा गया कि जातियों की पहले से कोई रजिस्ट्री न होने के कारण प्रक्रिया में ऐसी गड़बड़ियां होने की संभावना ज्यादा थी।

केंद्र ने कहा, "2011 की जनगणना से पहले जातियों की कोई रजिस्ट्री तैयार नहीं की गई थी।" उन्होंने जोर देकर कहा कि एक स्टैंडर्ड रजिस्ट्री या ड्रॉप-डाउन सिस्टम से ज्यादा सही डेटा मिल सकता था।

हलफनामे में आगे कहा गया कि कभी-कभी जाति के नामों की जगह नंबर या सिंबल का इस्तेमाल किया गया, जबकि लोगों ने कबीले, गोत्र, उप-जाति, जाति के नाम, टाइटल और मिलते-जुलते नामों का इस्तेमाल एक-दूसरे की जगह पर किया।

नतीजतन, केंद्र का कहना था कि उपलब्ध जाति डेटा एडमिशन, नौकरी या स्थानीय निकायों के चुनावों में आरक्षण का आधार नहीं बन सकता।

इसमें कहा गया, "ऊपर बताए गए अलग-अलग कारणों, जैसे डेटा इकट्ठा करने वालों की गलतियां, जनगणना करने के तरीके में कमियां और ऐसे ही कई अन्य कारण, की वजह से जाति-आधारित जनगणना का कोई भरोसेमंद डेटा उपलब्ध नहीं है। यह डेटा एडमिशन, प्रमोशन या स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण जैसी किसी भी संवैधानिक या कानूनी प्रक्रिया का आधार नहीं बन सकता।"

महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और ओबीसी से जुड़े एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने या राज्य के भीतर ओबीसी के बारे में ठोस डेटा इकट्ठा करने की इजाजत मांगी थी।

हालांकि, केंद्र ने महाराष्ट्र के उस तर्क पर भी आपत्ति जताई जिसमें उसने 'विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2021 के फैसले का हवाला दिया था। केंद्र का कहना था कि उस फैसले में खास तौर पर एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने का निर्देश नहीं दिया गया था।

केंद्र ने कहा कि गवली मामला कुछ जिला परिषदों और पंचायत समितियों में 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण से जुड़ा था और एसईसीसी-2011 डेटा न तो उस याचिका का विषय था और न ही सुप्रीम कोर्ट ने उस डेटा की कमियों पर कोई फैसला सुनाया था या सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था।

--आईएएनएस

एससीएच/एबीएम

Share:

Leave A Reviews

Related News