
असम में नागरिकता से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में गौहाटी हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि क्या सिर्फ दस्तावेज होना ही किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए काफी है? हाईकोर्ट ने असम के एक दिहाड़ी मजदूर की याचिका को खारिज करते हुए विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) के फैसले को बरकरार रखा है. इस व्यक्ति ने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अदालत में एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 15 दस्तावेज पेश किए थे.
मामले की सुनवाई करते हुए गौहाटी हाईकोर्ट ने साफ कहा कि विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत देश का नागरिक साबित करने की पूरी जिम्मेदारी खुद संबंधित व्यक्ति की होती है. केवल कई सारे सरकारी दस्तावेज जमा कर देना ही नागरिकता का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता. इसके लिए यह बेहद जरूरी है कि पेश किए गए दस्तावेज भारतीय कानून के अनुसार स्वीकार्य हों और उनसे व्यक्ति का अपने पूर्वजों के साथ एक स्पष्ट और विश्वसनीय वंश संबंध (लिंकेज) स्थापित होता हो.
याचिकाकर्ता ने अपनी नागरिकता के समर्थन में 1951 की एनआरसी प्रति, 1966 से 2017 तक की विभिन्न वोटर लिस्ट, 1973 के जमीन के कागजात और स्कूल प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज सौंपे थे. हालांकि, अदालत ने इन्हें मानने से इनकार कर दिया:
1951 की एनआरसी प्रति: कोर्ट ने कहा कि यह केवल कंप्यूटर से निकाला गया रिकॉर्ड था, जिसे भारतीय साक्ष्य कानून के तहत प्रमाणित नहीं किया गया था. इसके साथ जरूरी इलेक्ट्रॉनिक सर्टिफिकेट भी नहीं था.
स्कूल प्रमाणपत्र: इसे इसलिए खारिज किया गया क्योंकि कोर्ट में न तो स्कूल के प्रधानाचार्य को गवाह के तौर पर पेश किया गया और न ही स्कूल का मूल प्रवेश रजिस्टर दिखाया गया.
1973 के जमीन के कागजात: इस दस्तावेज से यह साफ नहीं हो सका कि जमीन कानूनी रूप से परिवार के उत्तराधिकारियों तक कैसे ट्रांसफर हुई.
हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में एक और बड़ी बात रेखांकित की. अदालत ने स्पष्ट किया कि पैन कार्ड (PAN Card) और वोटर आईडी कार्ड (Voter ID) केवल पहचान या टैक्स संबंधी दस्तावेज हैं, इन्हें भारतीय नागरिकता का कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता. इसके अलावा, याचिकाकर्ता द्वारा पेश की गई विभिन्न वर्षों की मतदाता सूचियों में भी गंभीर विसंगतियां मिलीं. परिवार के सदस्यों की उम्र में असामान्य अंतर पाया गया और अलग-अलग गांवों की वोटर लिस्ट में दर्ज नामों के बीच कोई विश्वसनीय दस्तावेजी कड़ी (लिंकेज) साबित नहीं हो सकी.
याचिकाकर्ता के पिता ने कोर्ट में मौखिक गवाही देकर बताया था कि नदी के कटाव के कारण उनका परिवार बार-बार गांव बदलता रहा, जिस वजह से अलग-अलग जगहों पर रिकॉर्ड बने. लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को भी नाकाफी माना. कोर्ट ने कहा कि नागरिकता जैसे गंभीर मामलों में केवल मौखिक बयानों के आधार पर फैसला नहीं हो सकता. इसके लिए कानूनन प्रमाणित और विरोधाभास रहित दस्तावेजी सबूत ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं.
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