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हरित हाइड्रोजन उत्पादन में 50 प्रतिशत की वृद्धि, आईआईटी ने विकसित की नई तकनीक


नई दिल्ली, 19 मई (आईएएनएस)। भारत ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जिससे सूरज की रोशनी की मदद से बनने वाले हरित हाइड्रोजन का उत्पादन पहले से कहीं ज्यादा अधिक व प्रभावी हो सकता है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इस नई तकनीक से हाइड्रोजन उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह रिसर्च आईआईटी गुवाहाटी में की गई है। दरअसल हरित हाइड्रोजन को भविष्य का स्वच्छ ईंधन माना जा रहा है, क्योंकि इसे बनाने में प्रदूषण नहीं होता।

नई दिल्ली, 19 मई (आईएएनएस)। भारत ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जिससे सूरज की रोशनी की मदद से बनने वाले हरित हाइड्रोजन का उत्पादन पहले से कहीं ज्यादा अधिक व प्रभावी हो सकता है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इस नई तकनीक से हाइड्रोजन उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह रिसर्च आईआईटी गुवाहाटी में की गई है। दरअसल हरित हाइड्रोजन को भविष्य का स्वच्छ ईंधन माना जा रहा है, क्योंकि इसे बनाने में प्रदूषण नहीं होता।

सामान्य तौर पर हाइड्रोजन उत्पादन में ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, लेकिन हरित हाइड्रोजन सूर्य की रोशनी से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करके तैयार किया जाता है। हालांकि, इस प्रक्रिया में भी दो बड़ी समस्याएं सामने आती थीं। पहली, इलेक्ट्रोड पर लगी उत्प्रेरक परत समय के साथ कमजोर होकर अलग होने लगती थी। दूसरी, गैस के बुलबुले सतह पर चिपक जाते थे, जिससे उत्पादन की गति धीमी हो जाती थी। इन्हीं चुनौतियों का समाधान खोजते हुए आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक खास कम्पोजिट कोटिंग तैयार की है। इसमें कार्बन नाइट्राइड नामक प्रकाश-सक्रिय पदार्थ को बुलबुला-रोधी हाइड्रोजेल परत के साथ निकेल फोम पर जोड़ा गया।

इस नई परत की मदद से गैस के बुलबुले सतह पर टिक नहीं पाते और प्रक्रिया लगातार बेहतर तरीके से चलती रहती है। आईआईटी गुवाहाटी के मुताबिक, यह नई कम्पोजिट कोटिंग तकनीक उत्पादन के सुधार में सक्षम है। इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में एक शोध-पत्र के रूप में प्रकाशित हुए हैं। इसे आईआईटी गुवाहाटी के प्रो. उत्तम मन्ना और प्रो. मोहम्मद कुरेशी के साथ डॉ. हृषिकेश सरमा और शोध विद्वान अल्पना साहू, अंशिका चौधरी, सुमंत सरकार, सौरव मंडल और लिंगराज साहू ने मिलकर लिखा है।

बता दें कि हाल के वर्षों में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए हरित हाइड्रोजन एक महत्वपूर्ण स्वच्छ ऊर्जा स्रोत बनकर उभरा है। पारंपरिक तरीकों से हाइड्रोजन बनाने पर बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जबकि हरित हाइड्रोजन सूर्य के प्रकाश की मदद से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करके तैयार किया जाता है।

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक विशेष कोटिंग विकसित की, जो गैस के बुलबुलों को सतह पर चिपकने से रोकती है। इसके लिए उन्होंने कार्बन नाइट्राइड नामक एक विशेष प्रकाश-सक्रिय पदार्थ को बुलबुला-रोधी हाइड्रोजेल परत के साथ निकेल फोम पर जोड़ा। पारंपरिक तरीकों में फोटोकैटेलिस्ट को सतह पर एक अलग परत के रूप में लगाया जाता है, लेकिन शोधकर्ताओं ने इसे सीधे कोटिंग के अंदर शामिल किया। इससे कैटेलिस्ट अधिक सुरक्षित रहा और पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करने की प्रक्रिया के लिए अधिक सक्रिय सतह उपलब्ध हुई।

यह तकनीक पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में, चाहे उनमें अलग बुलबुला-प्रतिरोधी परत हो या न हो, प्रतिक्रिया प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार लेकर आई। आईआईटी के मुताबिक, इससे हाइड्रोजन उत्पादन में 51 फीसदी से अधिक वृद्धि हुई है। वहीं, ऑक्सीजन उत्पादन में 44 प्रतिशत अधिक वृद्धि दर्ज की गई है।

आईआईटी गुवाहाटी के रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर, प्रो. उत्तम मन्ना ने कहा, “इस अध्ययन के परिणामस्वरूप हमने हाइड्रोजन उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है। इस तकनीक को व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है। भविष्य में अन्य उत्प्रेरकों का भी परीक्षण किया जा सकता है ताकि हरित हाइड्रोजन उत्पादन को और उन्नत बनाया जा सके।” यह नई तकनीक सूर्य की मदद से हरित हाइड्रोजन बनाने में उपयोगी हो सकती है। इसके अलावा, यह नवीकरणीय ऊर्जा को संग्रहित करने और सौर ऊर्जा को ईंधन में बदलने वाली तकनीकों को भी बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।

शोध के अगले चरण के बारे में बताते हुए प्रोफेसर मोहम्मद कुरेशी ने कहा, “हम पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करने की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए इस तकनीक को बेहतर फोटोकैटेलिस्ट के साथ विकसित करने की योजना बना रहे हैं। भविष्य में हम इसे बड़े उपकरणों पर लागू करने और व्यावहारिक सौर हाइड्रोजन उत्पादन प्रणालियों में इस्तेमाल करने पर भी काम करेंगे।” आईआईटी का कहना है कि फिलहाल यह शोध प्रयोगशाला स्तर पर है। इन निष्कर्षों को आगे सत्यापन की आवश्यकता है।

--आईएएनएस

जीसीबी/डीकेपी

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