नई दिल्ली, 14 मार्च (आईएएनएस)। आज जो हम दुनिया के एक कोने में बैठकर दूसरे कोने की कहानी पल भर में जान जाते हैं, फ्लाइट्स और समुद्र में तैरते जहाजों की स्थिति क्या है इसे एक क्लिक में जान लेते हैं, क्या कभी सोचा कि मुमकिन हुआ तो हुआ कैसे? एक 'डोमेन नेम' से इसकी शुरुआत हुई और देखते ही देखते इंटरनेट ने दुनिया के सामने ज्ञान का पिटारा खोल दिया।
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नई दिल्ली, 14 मार्च (आईएएनएस)। आज जो हम दुनिया के एक कोने में बैठकर दूसरे कोने की कहानी पल भर में जान जाते हैं, फ्लाइट्स और समुद्र में तैरते जहाजों की स्थिति क्या है इसे एक क्लिक में जान लेते हैं, क्या कभी सोचा कि मुमकिन हुआ तो हुआ कैसे? एक 'डोमेन नेम' से इसकी शुरुआत हुई और देखते ही देखते इंटरनेट ने दुनिया के सामने ज्ञान का पिटारा खोल दिया।
41 साल पहले इंटरनेट के इतिहास में एक अभूतपूर्व बदलाव आया, जिसने आगे चलकर पूरी दुनिया के संचार और कारोबार के तरीके बदल दिए। इसी दिन दुनिया का पहला डोमेन नाम 'सिंबॉलिक्स डॉट कॉम' पंजीकृत हुआ। यह डोमेन अमेरिकी कंप्यूटर कंपनी सिंबॉलिक्स आईएनसी के लिए दर्ज किया गया था। इसकी यात्रा बड़ी रोचक रही।
उस समय इंटरनेट अभी शुरुआती दौर में था और मुख्य रूप से विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक सीमित था। डोमेन नेम सिस्टम (डीएनएस) नया-नया बना था, और उस समय कोई सर्च इंजन, ब्राउजर या ई-कॉमर्स नहीं था। यह रजिस्ट्रेशन उनके वर्कस्टेशन के लिए एक डिजिटल पहचान बनाने का एक व्यावहारिक कदम था। यह "सेकंड-लेवल" डॉट कॉम डोमेन था और इसने कमर्शियल इंटरनेट डोमेन युग की शुरुआत की।
हर खूबसूरत आगाज का अंजाम उतना ही जहीन हो, ये जरूरी तो नहीं! ऐसा ही कुछ सिंबॉलिक्स के लिए भी कहा जा सकता है। बदलाव की हवा बह रही थी। 1980 के दशक के आखिर में पीसी क्रांति का दौर था। "लिस्प मशीन युग" खत्म होने लगा। सस्ते, आम इस्तेमाल वाले कंप्यूटर और वर्कस्टेशन की पूछ होने लगी, जिससे महंगे, खास लिस्प मशीनें कमर्शियल तौर पर फायदेमंद नहीं रहीं।
मुकाबले और तकनीकी बदलावों का सामना करते हुए, सिंबॉलिक्स समस्याओं के जंजाल में फंसती चली गई। घटती मांग और मैनेजमेंट की दिक्कतों की वजह से इसका ग्राफ "तेजी से नीचे गिरने" लगा। जिसका नतीजा दिवालिएपन के रूप में सामने आया और मूल सिंबॉलिक्स डॉट आईएनसी 7 मई, 1996 को बंद हो गई।
2005 तक बची हुई मशीनों के लिए सर्विस कॉन्ट्रैक्ट और बाद में 2016 तक यूएस रक्षा विभाग के साथ मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट से उसे सहारा मिलता रहा। अगस्त 2009 में, इस डोमेन को एक्सएफ डॉट कॉम इंवेस्टमेंट्स (अब नैपकिन डॉट कॉम) के एरन मायरस्डेट ने खरीद लिया। लेकिन आज भी सिंबॉलिक्स की दुनिया को देखा जा सकता है। नैपकिन डॉट कॉम ने इसे एक ऑनलाइन म्यूजियम के तौर पर जिंदा रखा है।
हो भी क्यों न! आखिर डोमेन नेम सिस्टम के जरिए वेबसाइट्स को आसान पहचान देने की शुरुआत जो इससे हुई थी।
आज अरबों वेबसाइट्स की दुनिया जिस ढांचे पर खड़ी है, उसकी पहली ईंट 15 मार्च 1985 को रखी गई थी।
--आईएएनएस
केआर/
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