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झुमरीतिलैया के केसरिया कलाकंद और गोड्डा की भगैया साड़ी सहित झारखंड के 11 पारंपरिक उत्पादों को जीआई टैग


रांची, 17 जून (आईएएनएस)। झारखंड की पारंपरिक कला, हस्तशिल्प, वस्त्र और खाद्य उत्पादों को बड़ी पहचान मिली है। राज्य के 11 उत्पादों को जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) टैग प्रदान किया गया है। अब झारखंड के जीआई टैग प्राप्त उत्पादों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। इसे राज्य की सांस्कृतिक विरासत, आदिवासी परंपराओं और स्थानीय कारीगरों की कला को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

रांची, 17 जून (आईएएनएस)। झारखंड की पारंपरिक कला, हस्तशिल्प, वस्त्र और खाद्य उत्पादों को बड़ी पहचान मिली है। राज्य के 11 उत्पादों को जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) टैग प्रदान किया गया है। अब झारखंड के जीआई टैग प्राप्त उत्पादों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। इसे राज्य की सांस्कृतिक विरासत, आदिवासी परंपराओं और स्थानीय कारीगरों की कला को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

जिन 11 उत्पादों को जीआई टैग मिला है, उनमें कुचाई सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक्स, भगैया साड़ी एवं फैब्रिक्स, दुमका चादर, पंछी परहन-पंछी साड़ी एवं फैब्रिक्स, झारखंड तसर सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक्स, झारखंड डोकरा शिल्प, झारखंड जनजातीय आभूषण, झारखंड बांस शिल्प, कोडरमा (झुमरी तिलैया) के केसरिया कलाकंद, झारखंड बेनम तथा जादोपटिया पेंटिंग शामिल हैं।

सीएम हेमंत सोरेन ने इसे झारखंड के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह सम्मान राज्य के कारीगरों, बुनकरों, किसानों और आदिवासी समुदायों के वर्षों के परिश्रम, कौशल और पारंपरिक ज्ञान की पहचान है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2019 में झारखंड का केवल एक उत्पाद जीआई टैग की सूची में शामिल था, जबकि अब यह संख्या बढ़कर 12 हो गई है।

उन्होंने कहा कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों को कानूनी सुरक्षा के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी तथा स्थानीय समुदायों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड के वाद्ययंत्र मांदर, पायतकर पेंटिंग, निमुचा शॉल, देवघर पेड़ा, कुसुमी लाह, लाह की चूड़ियां, साल बीज, महुआ फूल, करंज बीज, रागी, रुगड़ा और धुस्का समेत कई अन्य उत्पादों को भी जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया जारी है। जीआई टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक विशिष्टता और उसकी प्रामाणिकता को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। इससे संबंधित उत्पादों की नकली नकल पर रोक लगाने में मदद मिलती है और बाजार में उनकी अलग पहचान स्थापित होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे झारखंड के कारीगरों, बुनकरों, शिल्पकारों और किसानों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ निर्यात के नए अवसर भी खुलेंगे। राज्य सरकार के अनुसार इन उत्पादों को जीआई टैग मिलने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और पारंपरिक ज्ञान तथा शिल्पकला के संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। इस प्रक्रिया में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

बता दें कि भारत में जीआई टैग का प्रावधान ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट, 1999’ के तहत किया गया है। यह टैग किसी उत्पाद को उसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान के आधार पर कानूनी संरक्षण प्रदान करता है और इसकी वैधता 10 वर्षों तक होती है, जिसे बाद में नवीनीकृत कराया जा सकता है।

--आईएएनएस

एसएनसी/डीकेपी

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