श्रीनगर, 24 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी के जम्मू-कश्मीर महासचिव (संगठन) अशोक कौल ने सोमवार को कहा कि घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी सिर्फ टारगेटेड हत्याओं को रोकने पर ध्यान देने के बजाय, अलग-अलग समुदायों के बीच भरोसा फिर से कायम करने और भाईचारा मजबूत करने पर आधारित होनी चाहिए।
![]()
श्रीनगर, 24 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी के जम्मू-कश्मीर महासचिव (संगठन) अशोक कौल ने सोमवार को कहा कि घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी सिर्फ टारगेटेड हत्याओं को रोकने पर ध्यान देने के बजाय, अलग-अलग समुदायों के बीच भरोसा फिर से कायम करने और भाईचारा मजबूत करने पर आधारित होनी चाहिए।
श्रीनगर में सोमवार को पत्रकारों से बातचीत करते हुए कौल ने कहा कि घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी एक सकारात्मक घटनाक्रम है, क्योंकि इस समय जम्मू-कश्मीर में भाईचारे और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, "कश्मीरी पंडितों को घाटी में लौटते और अपनी पैतृक जगहों से फिर से जुड़ते देखना उत्साहजनक है।"
दक्षिण कश्मीर के जिलों में हाल ही में हुई लक्षित हत्याओं (टारगेटेड किलिंग्स) के बारे में बात करते हुए भाजपा नेता ने कहा कि ऐसी हत्याएं किसी खास जगह तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहां पूरी सुरक्षा की गारंटी दी जा सके।
कौल ने कहा कि घाटी में लौटने और अपना जीवन फिर से शुरू करने की प्रक्रिया में कश्मीरी पंडितों को चुनौतियों और संघर्षों का सामना करना पड़ेगा।
उन्होंने कहा, "टारगेट किलिंग रुकेंगी नहीं और भाईचारा बनाना जरूरी है।" उन्होंने सामाजिक सद्भाव बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया।
कश्मीरी पंडितों के पलायन पर कौल ने कहा कि वे तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन के आने से पहले ही घाटी छोड़ चुके थे। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय कश्मीर में कुछ लोगों ने बाहरी ताकतों का समर्थन किया था, जिससे उन ताकतों को बढ़ावा मिला।
कौल ने कहा कि घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास के लिए अनुकूल माहौल बनाने के मकसद से अलग-अलग समुदायों के बीच भाईचारे को मजबूत करने की कोशिशें जरूरी हैं।
पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों से जान को गंभीर खतरा होने के कारण 1990 के दशक में घाटी से कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था। इस समुदाय ने अपनी संपत्ति, आजीविका और अपनी सारी चीजें पीछे छोड़ दीं और बमुश्किल अपनी जान बचाकर वहां से निकले।
पिछले 37 वर्षों से कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं। इस समुदाय के साहस, संकल्प और शिक्षा की बदौलत कश्मीरी पंडितों ने देश और विदेश के अलग-अलग हिस्सों में खुद को स्थापित किया है।
लेकिन, जैसा कि कहावत है, आप कश्मीरी पंडित को कश्मीर से बाहर तो ले जा सकते हैं, लेकिन उनके अंदर से कश्मीर को कभी नहीं निकाल सकते।
--आईएएनएस
एससीएच/डीकेपी
Leave A Reviews