
रांची. मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित बरगी डैम में हुए क्रूज हादसे, जिसमें 13 लोगों की जान चली गई, उसके बाद भी झारखंड के पर्यटक और बोट संचालक अपनी आदतों में सुधार नहीं कर रहे हैं। झारखंड के प्रमुख जलाशयों और डैमों में बोटिंग के दौरान सुरक्षा नियमों की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। सबसे डरावना मंजर तब दिखता है जब पर्यटक बीच पानी में पहुँचने के बाद अच्छी 'सेल्फी' लेने की होड़ में लाइफ जैकेट उतार देते हैं। यह छोटी सी लापरवाही कभी भी बड़े जल-तांडव का कारण बन सकती है।
झारखंड में जल हादसों का इतिहास काफी दर्दनाक रहा है। 17 जुलाई 2022 को कोडरमा के पंचखेरो डैम में नाव पलटने से एक ही परिवार के 8 लोगों की डूबकर मौत हो गई थी। जांच में पाया गया था कि उस समय किसी ने भी लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी। आज भी तिलैया और पंचखेरो डैम में जमीनी हकीकत चिंताजनक है। निरीक्षण के समय तो नियम माने जाते हैं, लेकिन आम दिनों में जैकेट केवल दिखावे की वस्तु बनकर रह गई है।
राजधानी रांची के धुर्वा डैम और बड़ा तालाब में भी पूर्व में कई हादसे हो चुके हैं। इसके विपरीत, कुछ जिलों में जबलपुर हादसे के बाद सक्रियता बढ़ी है:
पलामू: भीम बैराज, काशी सोत और मुरमा मलय डैम पर अब बिना लाइफ जैकेट एंट्री बंद कर दी गई है।
पतरातू लेक रिसॉर्ट: यहाँ नाविक संघ ने सख्ती बढ़ा दी है। नाविकों को गोताखोरी और लाइफ सेविंग तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
बड़ा तालाब: यहाँ 12 साल पहले हुए हादसे के बावजूद आज भी कई पर्यटक जैकेट को सही ढंग से नहीं बांधते।
हादसे का खतरा केवल जैकेट न पहनने से ही नहीं, बल्कि उनकी खराब गुणवत्ता से भी है।
नियमित जांच का अभाव: डैमों पर मौजूद लाइफ जैकेट पुरानी और फटी हुई हैं, जिनकी हवा रोकने की क्षमता खत्म हो चुकी है।
वजन का गणित गायब: जैकेट व्यक्ति के वजन के अनुसार होनी चाहिए, लेकिन यहाँ एक ही साइज की जैकेट बच्चों और वयस्कों सबको पहना दी जाती है।
ट्रेनिंग की कमी: बोट संचालक पर्यटकों को यह नहीं बताते कि दुर्घटना की स्थिति में जैकेट का सही उपयोग कैसे करना है।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि वे नियम बना सकते हैं और सख्ती कर सकते हैं, लेकिन जब तक पर्यटक खुद अपनी जान की कीमत नहीं समझेंगे, तब तक हादसों को रोकना मुश्किल है। बीच पानी में फोटो के चक्कर में जैकेट उतारना आत्महत्या के समान है।
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