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बांधवगढ़ के नन्हे शावक बढ़ाएंगे बाघों की सल्तनत, फिर टाइगर स्टेट बनेगा मध्यप्रदेश

उमरिया जिले का विश्वप्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व एक बार फिर देश-दुनिया की निगाहों में है। वजह है यहां तेजी से बढ़ती बाघों की संख्या और बाघिनों के साथ लगातार नजर आ रहे शावक, जो आने वाले समय में मध्यप्रदेश की बाघ शक्ति को और मजबूत करने वाले हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बांधवगढ़ के ये शावक ही मध्यप्रदेश को एक बार फिर मजबूती से “टाइगर स्टेट” की बादशाहत दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

रॉयल बंगाल टाइगर का गढ़ है बांधवगढ़

बांधवगढ़ की पहचान हमेशा से रॉयल बंगाल टाइगर के सबसे मजबूत गढ़ के रूप में रही है। यहां बाघों की साइटिंग के लिए न केवल देश, बल्कि विदेशों से भी पर्यटक पहुंचते हैं। मध्यप्रदेश को देश में सबसे ज्यादा बाघों वाला राज्य बनाने में बांधवगढ़ का योगदान सबसे अहम माना जाता है और मौजूदा हालात इशारा कर रहे हैं कि यह बढ़त आगे भी कायम रह सकती है।

2022 की गणना में 165 बाघ, शावक अलग

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय के अनुसार वर्ष 2022 की बाघ गणना में बांधवगढ़ लैंडस्केप में करीब 165 बाघ दर्ज किए गए थे। यह आंकड़ा केवल एक वर्ष से अधिक उम्र के बाघों का था। गणना के दौरान कई बाघिनें अपने नन्हे शावकों के साथ दिखाई दी थीं, जिससे यह साफ हो गया था कि आने वाले वर्षों में यहां बाघों की संख्या में बड़ा इजाफा तय है।

200 के पार जा सकती है संख्या

पिछले चार वर्षों में लगातार शावकों की साइटिंग को देखते हुए वन विभाग का अनुमान है कि बांधवगढ़ में बाघों की संख्या 200 के आंकड़े को भी पार कर सकती है। यही कारण है कि यह क्षेत्र वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के लिए खास केंद्र बना हुआ है।

मध्यप्रदेश में 49% की रिकॉर्ड बढ़ोतरी

भारत सरकार की 2022 की बाघ गणना के अनुसार देश में कुल 3,682 बाघ पाए गए थे, जिनमें से 785 बाघ अकेले मध्यप्रदेश में दर्ज किए गए। 2018 से 2022 के बीच जहां देशभर में बाघों की संख्या करीब 24 प्रतिशत बढ़ी, वहीं मध्यप्रदेश में यह वृद्धि लगभग 49 प्रतिशत रही। यह आंकड़ा राज्य के बेहतर संरक्षण और प्रबंधन की गवाही देता है।

हर 10 वर्ग किलोमीटर में एक बाघ

बांधवगढ़ की खास बात सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि बाघों का घनत्व भी है। यहां औसतन हर 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक बाघ मौजूद है। इसी वजह से सफारी के दौरान बाघ दिखने की संभावना बेहद ज्यादा रहती है। कई बार बाघ रिजर्व से बाहर आसपास के जंगलों में भी दिखाई देते हैं।

बढ़ती आबादी, बढ़ती चुनौतियां

हालांकि बढ़ती बाघ संख्या के साथ चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। सीमित क्षेत्र और बाघों की टेरिटोरियल प्रवृत्ति के कारण आपसी संघर्ष की घटनाएं सामने आ रही हैं। बीते कुछ वर्षों में टेरिटरी की लड़ाई में बाघों और शावकों की मौत के मामले भी दर्ज किए गए हैं।

जनवरी 2026 में चार बाघों की मौत

साल 2026 की शुरुआत बांधवगढ़ के लिए चिंता लेकर आई। जनवरी माह में चार बाघों की मौत हुई। इनमें कुछ मौतें आपसी संघर्ष के कारण हुईं, जबकि एक बाघ शिकार के दौरान कुएं में गिर गया। वहीं एक बाघिन की मौत सोलर फेंसिंग में फंसने से हुई, जब वह नया इलाका तलाशते हुए रिजर्व से बाहर निकल गई थी।

क्षेत्रफल बढ़ाने की जरूरत

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व करीब 1536 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है, जिसमें 716 वर्ग किलोमीटर कोर और 820 वर्ग किलोमीटर बफर जोन शामिल है। वर्ष 1968 में नेशनल पार्क घोषित होने के समय इसका क्षेत्रफल सिर्फ 105 वर्ग किलोमीटर था। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती बाघ आबादी को सुरक्षित रखने के लिए अब रिजर्व के क्षेत्रफल का और विस्तार जरूरी है।

सफेद बाघ की जन्मभूमि, भविष्य की उम्मीद

बांधवगढ़ का इतिहास भी खास है। यह सफेद बाघ की जन्मस्थली के रूप में जाना जाता है। वर्ष 1951 में यहीं से ‘मोहन’ नाम का पहला सफेद बाघ शावक मिला था। आज उसके वंशज दुनिया भर के चिड़ियाघरों में मौजूद हैं।
कुल मिलाकर, बांधवगढ़ के जंगलों में खेलते ये नन्हे शावक सिर्फ पर्यटकों का आकर्षण नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के लिए भविष्य की बड़ी उम्मीद हैं। अगर संरक्षण और प्रबंधन इसी तरह मजबूत रहा, तो यही शावक आने वाले समय में प्रदेश को फिर से टाइगर स्टेट की बादशाहत दिलाने वाले साबित होंगे।

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