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मां श्वेता तिवारी नहीं देती करियर में दखल, फैसले हमेशा अपने दिल से लेती हूं : पलक तिवारी


मुंबई, 12 मई (आईएएनएस)। बॉलीवुड एक्ट्रेस पलक तिवारी लगातार अपने करियर को लेकर चर्चा में रहती हैं। इन दिनों वह अपनी वेब सीरीज 'लुक्खे' को लेकर चर्चा में हैं। इस बीच आईएएनएस के साथ बातचीत में उन्होंने अपनी मां और टीवी की मशहूर अभिनेत्री श्वेता तिवारी के साथ बॉन्ड को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि मां ने उनके करियर में कभी भी दखल नहीं दिया। उन्होंने जो भी अब तक फैसले लिए हैं, खुद और दिल से लिए हैं।

मुंबई, 12 मई (आईएएनएस)। बॉलीवुड एक्ट्रेस पलक तिवारी लगातार अपने करियर को लेकर चर्चा में रहती हैं। इन दिनों वह अपनी वेब सीरीज 'लुक्खे' को लेकर चर्चा में हैं। इस बीच आईएएनएस के साथ बातचीत में उन्होंने अपनी मां और टीवी की मशहूर अभिनेत्री श्वेता तिवारी के साथ बॉन्ड को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि मां ने उनके करियर में कभी भी दखल नहीं दिया। उन्होंने जो भी अब तक फैसले लिए हैं, खुद और दिल से लिए हैं।

आईएएनएस से बात करते हुए पलक तिवारी ने कहा, "मेरी और मेरी मां की जिंदगी पूरी तरह अलग दौर और अनुभवों से गुजरी है, जिसके चलते हम दोनों के सोचने का तरीका अलग है। कहानियों को समझने का नजरिया भी अलग है। एक कलाकार के तौर पर हर व्यक्ति का अपना एक अलग सफर होता है, और उसी सफर के अनुभव उसके फैसलों को प्रभावित करते हैं। मेरी मां ने जिस समय और माहौल में काम किया, वह आज के समय से बहुत अलग था, इसलिए हम दोनों के दृष्टिकोण भी अलग हैं।"

पलक ने कहा, ''मेरी मां कभी भी मेरे करियर में दखल नहीं देतीं। वह सिर्फ मार्गदर्शन करती हैं, लेकिन किसी भी तरह का दबाव नहीं डालतीं। उन्होंने हमेशा से मुझे स्वतंत्र रूप से सोचने और फैसले लेने के लिए प्रेरित किया है। उनका मानना है कि कलाकार को अपने फैसले खुद लेने चाहिए, क्योंकि वही उसके करियर को सही दिशा देते हैं।''

इंटरव्यू के दौरान पलक ने बताया, ''मां हमेशा मुझसे यही पूछती हैं कि जो प्रोजेक्ट मैं चुन रही हूं, क्या वह सच में मेरे दिल को पसंद है या नहीं। वह मुझे किसी भी प्रोजेक्ट के लिए मजबूर नहीं करतीं, बल्कि यह समझने की कोशिश करती हैं कि क्या वह काम पलक के लिए सही है या नहीं।''

पलक ने आगे कहा, ''मां ने हमेशा मुझे यह सलाह दी है कि मैं अपने दिल की आवाज को सुनूं। एक कलाकार के लिए सबसे जरूरी चीज यही है कि वह अपने काम से भावनात्मक रूप से जुड़ा हो। अगर कहानी या किरदार अंदर से महसूस नहीं होता, तो उसे करना सिर्फ एक काम बनकर रह जाता है, जबकि अभिनय का असली मजा तभी आता है, जब वह दिल से जुड़ा हो।''

--आईएएनएस

पीके/एबीएम

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