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ममता बनर्जी और पिनाराई विजयन के सामने नई राजनीतिक चुनौतियां, बदले हालात की कसौटी पर दोनों नेता


तिरुवनंतपुरम/कोलकाता, 10 जून (आईएनएस)। पिछले डेढ़ दशक से भी अधिक समय तक पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और केरल में पिनाराई विजयन अपने-अपने राज्यों की राजनीति और सत्ता के निर्विवाद केंद्र बने रहे। वे क्रमशः अपनी पार्टियों और सरकारों की ऐसी आवाज रहे, जिनके नेतृत्व और फैसलों पर शायद ही कभी कोई सवाल उठाया गया हो।

तिरुवनंतपुरम/कोलकाता, 10 जून (आईएनएस)। पिछले डेढ़ दशक से भी अधिक समय तक पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और केरल में पिनाराई विजयन अपने-अपने राज्यों की राजनीति और सत्ता के निर्विवाद केंद्र बने रहे। वे क्रमशः अपनी पार्टियों और सरकारों की ऐसी आवाज रहे, जिनके नेतृत्व और फैसलों पर शायद ही कभी कोई सवाल उठाया गया हो।

लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद इन दोनों में एक राजनीतिक समानता सामने आई है। वो यह है कि दोनों नेता अब मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद ममता बनर्जी का दबदबा अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जो नेता कभी हाईकमान के इशारे पर काम करते थे, वे अब टीएमसी से दूरी बनाते दिख रहे हैं, क्योंकि पश्चिम बंगाल भाजपा अपना प्रभाव बढ़ा रही है जिसकी वजह से तृणमूल कांग्रेस को अपनी राजनीतिक जगह बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा ह।ै

वहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-मार्क्सिस्ट (सीपीआई-एम), जिसने ममता बनर्जी की तृणमूल द्वारा सत्ता से हटाए जाने से पहले तीन दशक से ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल पर शासन किया था, अब अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी को भाजपा के उभार के खिलाफ संघर्ष करते हुए देख रही है।

केरल में पूर्व सीएम पिनाराई विजयन की कहानी ने एक अलग मोड़ लिया है।

एक दशक तक सत्ता में रहने के बाद, 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की जीत के बाद उनकी काम करने और शासन चलाने की शैली की आलोचना उनकी अपनी पार्टी के मंचों पर भी हुई।

दस साल बाद यूडीएफ की सत्ता में वापसी को व्यापक रूप से विजयन प्रशासन को राजनीतिक रूप से नकारने के तौर पर देखा गया। फिर भी, बंगाल के विपरीत जहां ममता बनर्जी को खुले तौर पर आंतरिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, विजयन के खिलाफ आलोचना सीपीआई-एम के भीतर जल्दी ही कम होती दिखी।

गहरी चर्चा और आत्म-आलोचना के बाद संगठन ने अंततः अपने अनुभवी नेता का समर्थन किया।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर उनकी बेटी वीणा विजयन से जुड़ी जांच के सिलसिले में उनके किराए के घर पर ईडी की तलाशी से जुड़ी अप्रत्याशित घटनाएं न हुई होतीं, तो विजयन शायद उसी राजनीतिक अधिकार के साथ बने रहते। इस घटना ने कुछ समय के लिए उनके आसपास के राजनीतिक संतुलन को बिगाड़ दिया था।

दोनों नेताओं की ओर से हालिया राजनीतिक संकेत भी अहम रहे हैं। ममता बनर्जी, जो अक्सर विपक्षी मंच से दूरी बनाए रखती थीं, हाल ही में इंडिया ब्लॉक की बैठक में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के साथ देखी गईं, जो उनकी राजनीतिक स्थिति में एक बड़ा बदलाव है। पिनाराई विजयन खुद तो मौजूद नहीं थे, लेकिन उनके भरोसेमंद सहयोगी और राज्यसभा सदस्य जॉन ब्रिटास ने सीपीआई-एम की ओर से बैठक में हिस्सा लिया। इससे यह साफ हुआ कि केरल के दिग्गज नेता भी विपक्ष की बड़ी रणनीति से पूरी तरह अलग नहीं हुए हैं।

दो नेता, दो राज्य, दो राजनीतिक सफर, लेकिन संदेश एक। सबसे ताकतवर क्षेत्रीय नेताओं को भी आखिरकार बदलती राजनीतिक हकीकत की कसौटी पर खरा उतरना ही पड़ता है।

--आईएएनएस

वीकेयू/वीसी

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