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मंत्री दीपक प्रकाश के एमएलसी बनने की सूचना पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगी नामांकन से जुड़ी अधिसूचना


नई दिल्ली, 7 अगस्त (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बिहार सरकार से कहा कि वह बिहार पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य नियुक्त करने से जुड़ा नोटिफिकेशन रिकॉर्ड पर रखे। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया था कि उन्हें उच्च सदन के लिए नॉमिनेट किया गया है और उन्होंने शपथ भी ले ली है।

नई दिल्ली, 7 अगस्त (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बिहार सरकार से कहा कि वह बिहार पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य नियुक्त करने से जुड़ा नोटिफिकेशन रिकॉर्ड पर रखे। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया था कि उन्हें उच्च सदन के लिए नॉमिनेट किया गया है और उन्होंने शपथ भी ले ली है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) और जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने बिहार सरकार की ओर से दी गई इस जानकारी को रिकॉर्ड पर लिया कि दीपक प्रकाश को अब बिहार विधान परिषद का सदस्य नियुक्त कर दिया गया है और उन्होंने शपथ भी ले ली है।

बिहार सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अयोग्यता का मुद्दा अब खत्म हो गया है क्योंकि प्रकाश को एमएलसी के तौर पर नॉमिनेट किया गया है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से विधान परिषद में उनकी नियुक्ति से जुड़ा नोटिफिकेशन पेश करने को कहा और सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई टाल दी।

सुनवाई के दौरान, बिहार सरकार ने आग्रह किया कि बाद के घटनाक्रम को देखते हुए मामले को बंद कर दिया जाए। हालांकि, याचिकाकर्ता ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि कथित संवैधानिक उल्लंघन पहले ही हो चुका है और अपनाई गई प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध केस स्टेटस के अनुसार, इस मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को होने की संभावना है। यह विवाद दीपक प्रकाश के राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य न होने के बावजूद बिहार के पंचायती राज मंत्री बने रहने को लेकर शुरू हुआ था।

पिछले महीने, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बिहार सरकार को उस संवैधानिक आधार के बारे में बताना होगा जिसके तहत किसी ऐसे व्यक्ति को, जो न तो विधानसभा का सदस्य था और न ही विधान परिषद का, संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत तय छह महीने की अवधि से अधिक समय तक मंत्री बने रहने दिया गया।

यह टिप्पणी याचिकाकर्ता के वकील की इस दलील के बाद आई थी कि छह महीने से अधिक समय बीत चुका है और दीपक प्रकाश किसी भी सदन के लिए चुने न जाने के बावजूद मंत्री पद पर बने हुए हैं।

तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह मामला पूरी तरह से कानून से जुड़ा सवाल है।

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने बिहार में नई सरकार बनने के बाद दीपक प्रकाश की पंचायती राज मंत्री के तौर पर दोबारा नियुक्ति को चुनौती देने वाली पीआईएल पर नोटिस जारी किया था।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) से जुड़ा एक अहम संवैधानिक सवाल उठाया गया था, जो किसी ऐसे व्यक्ति को, जो विधायक नहीं है, अधिकतम छह महीने तक मंत्री के तौर पर काम करने की इजाजत देता है; इस अवधि के भीतर उस व्यक्ति को विधानमंडल का सदस्य बनना जरूरी होता है।

याचिका के अनुसार, दीपक प्रकाश को राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य न होने के बावजूद 20 नवंबर, 2025 को पहली बार बिहार कैबिनेट में शामिल किया गया था। 15 अप्रैल को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के बाद, प्रकाश को 7 मई को फिर से पंचायती राज मंत्री नियुक्त किया गया।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस दोबारा नियुक्ति का इस्तेमाल अनुच्छेद 164(4) के तहत प्रकाश को प्रभावी रूप से छह महीने का और कार्यकाल देने के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वही विधानसभा बनी हुई हो।

एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2001 के फैसले का हवाला देते हुए, याचिका में कहा गया कि अनुच्छेद 164(4) के तहत संवैधानिक अपवाद एक बार मिलने वाली सुविधा है और इसे इस्तीफे, मंत्रालय में बदलाव, कैबिनेट में फेरबदल या दोबारा नियुक्ति के जरिए बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

याचिका में तर्क दिया गया कि किसी ऐसे व्यक्ति को बार-बार मंत्री पद पर नियुक्त करने की अनुमति देना, जो चुना हुआ नहीं है, संसदीय लोकतंत्र, प्रतिनिधि सरकार, सामूहिक जिम्मेदारी और चुनावी जवाबदेही को कमजोर करेगा।

यह विवाद तब और बढ़ गया जब हालिया चुनावों में बिहार विधान परिषद की खाली सीटों के लिए एनडीए के उम्मीदवारों में प्रकाश का नाम शामिल नहीं था, जबकि वे पंचायती राज मंत्री बने हुए थे।

हालांकि, 31 जुलाई को भाजपा एमएलसी देवेश कुमार ने बिहार विधान परिषद में अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया, जिससे एक सीट खाली हो गई और दीपक प्रकाश के उच्च सदन में जाने का रास्ता साफ हो गया। इसके बाद उन्हें राज्यपाल कोटे से बिहार विधान परिषद के लिए नामित किया गया और उन्होंने एमएलसी के तौर पर शपथ ले ली है।

--आईएएनएस

एससीएच/पीएम

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