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पंचायत चुनाव में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार को लगाई फटकार


लखनऊ, 3 जून (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में हो रही देरी और ग्राम प्रधानों के कार्यकाल को बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफ कहा कि पंचायतों का कार्यकाल संविधान के अनुसार निश्चित होता है और इसे किसी भी हाल में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

लखनऊ, 3 जून (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में हो रही देरी और ग्राम प्रधानों के कार्यकाल को बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफ कहा कि पंचायतों का कार्यकाल संविधान के अनुसार निश्चित होता है और इसे किसी भी हाल में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह 10 जुलाई तक पंचायत चुनावों का स्पष्ट और विस्तृत कार्यक्रम अदालत के सामने पेश करे। साथ ही ओबीसी आरक्षण से जुड़े मुद्दे पर गठित आयोग को भी अपनी रिपोर्ट समय पर दाखिल करने का आदेश दिया गया।

मामले की सुनवाई को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने जानकारी दी कि मंगलवार को यह मामला कोर्ट में आया था। उस समय अदालत ने राज्य सरकार के वकील को निर्देश दिया था कि वे सरकार से जरूरी निर्देश प्राप्त कर अगली सुनवाई में जानकारी दें। इसके बाद मामला बुधवार को फिर से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।

बुधवार को सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि सरकार ने 19 मई को एक ओबीसी आयोग का गठन किया है, जिसका कार्यकाल छह महीने का है। सरकार का कहना था कि आयोग अपनी रिपोर्ट छह महीने में तैयार करेगा और उसी रिपोर्ट के आधार पर पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण को लेकर निर्णय लिया जाएगा। सरकार की दलील थी कि रिपोर्ट आने के बाद ही चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।

लेकिन इस दलील से हाई कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ और उसने कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पांच साल का होता है और इसे किसी भी स्थिति में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो चुका है, इसलिए अब बिना चुनाव कराए प्रशासनिक व्यवस्था को लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार की यह जिम्मेदारी थी कि कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नए पंचायत चुनाव कराकर नई पंचायतों का गठन सुनिश्चित किया जाता। अदालत ने टिप्पणी की कि अगर ओबीसी आयोग का गठन जरूरी था तो यह काम पहले ही किया जाना चाहिए था ताकि चुनाव प्रक्रिया प्रभावित न हो।

अदालत ने सरकार के रवैये पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि संवैधानिक प्रक्रिया में देरी स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पंचायत लोकतंत्र की सबसे निचली लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई है और इसमें खालीपन नहीं छोड़ा जा सकता।

सुनवाई के बाद कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि राज्य निर्वाचन आयोग 10 जुलाई तक चुनाव का पूरा कार्यक्रम पेश करे। साथ ही ओबीसी आयोग को भी निर्देश दिया गया कि वह अपनी रिपोर्ट उसी तारीख तक अदालत के सामने प्रस्तुत करे।

--आईएएनएस

पीआईएम/डीकेपी

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