
नई दिल्ली। विवादास्पद राष्ट्र के नाम संबोधन- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के लोकसभा में पारित न होने पर दिए गए राष्ट्र के नाम संबोधन ने एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। देश के लगभग 700 से अधिक बुद्धिजीवियों, पूर्व नौकरशाहों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर इसे 'आदर्श आचार संहिता' (MCC) का उल्लंघन बताया है। शिकायतकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव की घोषणा के बाद सरकारी मशीनरी और सार्वजनिक धन से संचालित प्लेटफॉर्म्स का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए करना निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया के सिद्धांतों के विरुद्ध है। इस पत्र ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
शिकायत में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रधानमंत्री का यह संबोधन दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो और संसद टीवी जैसे सरकारी चैनलों पर लाइव प्रसारित किया गया। बुद्धिजीवियों का कहना है कि इन माध्यमों का संचालन जनता के टैक्स के पैसों से होता है, इसलिए इनका उपयोग किसी एक दल के पक्ष में चुनावी माहौल बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। पत्र में मांग की गई है कि यदि प्रधानमंत्री को विशेष समय दिया गया था, तो विपक्षी दलों को भी अपनी बात रखने के लिए समान समय (Equal Time) उपलब्ध कराया जाना चाहिए था। इसे सत्ता पक्ष को मिलने वाला एक अनुचित लाभ बताया गया है।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, पीएम मोदी ने अपने भाषण के दौरान महिला आरक्षण के मुद्दे पर विपक्षी दलों की आलोचना की। चुनावी मौसम में विपक्ष पर इस तरह के हमले को एक राजनीतिक प्रचार के रूप में देखा जा रहा है। योगेंद्र यादव, नजीब जंग और दिग्विजय सिंह जैसे प्रमुख हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि यह संबोधन पूरी तरह से मतदाताओं को प्रभावित करने के उद्देश्य से दिया गया था। उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की है कि इस भाषण की पूरी ट्रांसक्रिप्ट की जांच की जाए और यदि यह नियमों के खिलाफ पाया जाता है, तो इसे सभी सरकारी वेबसाइटों और आधिकारिक सोशल मीडिया रिकॉर्ड्स से तत्काल प्रभाव से हटाया जाए।
700 से अधिक नामों वाली इस सूची में शिक्षाविद जोया हसन और संगीतकार टी.एम. कृष्णा जैसे लोग भी शामिल हैं। इन लोगों ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या इस प्रसारण के लिए आयोग से पूर्व अनुमति ली गई थी। यदि ऐसा नहीं हुआ है, तो इसे आचार संहिता का खुला उल्लंघन मानते हुए जिम्मेदार अधिकारियों और पक्षों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। पत्र में चेतावनी दी गई है कि अगर इस तरह के मामलों पर आयोग चुप रहता है, तो इससे लोकतंत्र की नींव और चुनाव प्रणाली की विश्वसनीयता पर बुरा असर पड़ेगा। अब सबकी नजरें चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं।
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