नई दिल्ली, 11 अगस्त (आईएएनएस)। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने पॉक्सो कानून के प्रावधानों में ढील देने की मांग को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि भारत में कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है और बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों में किसी भी तरह का बदलाव बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए।
![]()
नई दिल्ली, 11 अगस्त (आईएएनएस)। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने पॉक्सो कानून के प्रावधानों में ढील देने की मांग को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि भारत में कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है और बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों में किसी भी तरह का बदलाव बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए।
प्रियांक कानूनगो ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण बहस चल रही है, जिसमें कुछ पक्ष 16 या 15 साल की उम्र में यौन संबंधों के लिए सहमति की अनुमति देने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसी किसी भी व्यवस्था का गलत फायदा उठाए जाने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बच्चों की तस्करी और यौन शोषण करने वाले लोग ऐसी किसी छूट का फायदा उठा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर 17 संगठनों और व्यक्तियों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी चिंताएं रखी हैं। उनका तर्क है कि कम उम्र में यौन संबंधों को लेकर सहमति की कानूनी सीमा बदलने से बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर सवाल पैदा हो सकते हैं। कानूनगो ने यह भी कहा कि किशोर उम्र पढ़ाई, व्यक्तित्व विकास और भविष्य की तैयारी का समय होता है। ऐसे में बच्चों को यौन शोषण और उससे जुड़े दबावों से बचाना समाज और व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
उन्होंने उन मामलों का भी जिक्र किया, जहां नाबालिग लड़कियों और उनसे काफी अधिक उम्र के पुरुषों के बीच संबंधों को बाद में शादी का रूप देकर कानूनी कार्रवाई खत्म करने की मांग की जाती है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि 15 या 16 साल की उम्र में कोई भी वास्तव में कितनी समझदारी से ऐसे गंभीर फैसले ले सकता है। उन्होंने कहा कि किसी नाबालिग के साथ यौन अपराध होने के बाद उसे उसी व्यक्ति से शादी करने या उसके साथ रहने के लिए मजबूर करना न्याय नहीं हो सकता।
प्रियांक कानूनगो ने ऐसे मामलों में बच्चों की इच्छा, सुरक्षा और मानसिक स्थिति को सबसे ज्यादा महत्व देने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि सिर्फ यह तर्क कि संबंधित व्यक्ति बाद में शादीशुदा जीवन में रह रहे हैं, किसी कथित अपराध को खत्म करने का आधार नहीं बनना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई के दौरान बच्चों के अधिकारों, उनकी सुरक्षा और कानून के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखेगा।
--आईएएनएस
पीआईएम/पीएम
Leave A Reviews