मेहसाणा, 17 सितंबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर उनके सहपाठी और वर्तमान में बीएसएनल से रिटायर जमीयत उलेमा ए हिंद के मेहसाणा के सदर दौलत खान पठान से आईएएनएस ने खास बातचीत की।
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मेहसाणा, 17 सितंबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर उनके सहपाठी और वर्तमान में बीएसएनल से रिटायर जमीयत उलेमा ए हिंद के मेहसाणा के सदर दौलत खान पठान से आईएएनएस ने खास बातचीत की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन के दोस्त दौलत खान पठान की एक अनोखी, पुरानी यादों को ताजा करने वाली तस्वीर, गुजरात के वडनगर में उनकी शुरुआती जिंदगी की एक करीबी झलक दिखाती है। दौलत खान पास के पठान मोहल्ले में 250 से 300 घरों वाले मोहल्ले में रहते थे। उन्होंने बताया कि प्रेरणा स्कूल में क्लास 4 से 7 तक नरेंद्र मोदी के साथ पढ़ाई की थी।
प्रधानमंत्री मोदी और दौलत खान पठान के बचपन का एक अहम पल 1961 में आया था। जब दोनों लड़के डॉ. वसंत पारिख के अंडर आरएसएस में शामिल होना चाहते थे लेकिन उनके पास 1 रुपये की फीस नहीं थी। नरेंद्र मोदी खुद पठान के घर गए ताकि उनकी मां को पैसे देने के लिए मना सकें जबकि पठान पीएम मोदी की मां हीराबा के पास गए और उन्हें 1 रुपया देने के लिए मनाया, जिससे दोनों रजिस्टर हो गए।
कई दशक बाद 2009 में गुजरात के मुख्यमंत्री के ऑफिस में एक मीटिंग के दौरान मोदी ने पठान के साथ बचपन की उन बातों को प्यार से याद किया। नरेंद्र मोदी ने मजाक में उन्हें रिटायरमेंट पर 'आधा गुजरात' देने की पेशकश की। हालांकि परिवार की जिम्मेदारियों ने पठान को भाजपा की एक्टिव पॉलिटिक्स में शामिल होने से रोक दिया।
प्रधानमंत्री मोदी और दौलत खान पठान के बीच हाई स्कूल के साल अच्छी एकेडमिक दोस्ती, डिबेट कॉम्पिटिशन और शुरुआती सर्विस के कामों से भरे थे। दोनों ने रेगुलर तौर पर हर हफ्ते बुधवार को होने वाली डिबेट में टॉप जगह हासिल की। जिसमें पठान ने 1965 में दिवंगत मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता पर हुई डिबेट के बाद मोदी को न्यूजपेपर पढ़ने के लिए लाइब्रेरी जाने के लिए बढ़ावा दिया। लगभग उसी समय, डॉ. वसंत पारिख ने युवा मोदी को कम्युनिटी सर्विस में गाइड किया, जिससे वह और आरएसएस के दूसरे लड़के चंपा, नवापुरा और सुल्तानपुरा जैसे सूखाग्रस्त गांवों में सब्सिडी वाले बाजरे (2 रुपये में 5 किलो) के भारी बैग ले जाने लगे।
प्रधानमंत्री मोदी के घर में बहुत ज्यादा गरीबी थी। पीएम मोदी की मां कुएं से पानी निकालकर और बर्तन धोकर एक बर्तन के लिए एक आना कमाती थीं। इसने उनके पूरे समय देश की सेवा करने के इरादे को पूरी तरह से बदल दिया। डॉ. पारिख और आरएसएस के निस्वार्थ समर्पण के सिद्धांतों से प्रेरित होकर नरेंद्र मोदी ने शादी न करने का फैसला किया और तीन साल तक साधु बनकर पूरे भारत में घूमने के लिए घर छोड़ दिया और पूरी तरह से भीख पर गुजारा किया।
वर्ष 1971 में गुजरात लौटकर अहमदाबाद में खड़िया आरएसएस ऑफिस में रहने लगे उन्होंने 1975 की इमरजेंसी के दौरान जेल में बंद विपक्षी नेताओं की सेवा की। अपनी पहली किताब 'संघर्ष मा गुजरात' लिखी और 1977 की मोरबी बाढ़ के दौरान बरामद हर सोने का गहना पुलिस को सौंपकर बहुत सम्मान पाया।
अपने राजनीतिक उत्थान के दौरान मोदी ने सार्वजनिक कर्तव्य और पारिवारिक मामलों के बीच सख्त सीमाएं बनाए रखीं। एक बार 1990 में अपने बड़े भाई सोमभाई का ट्रांसफर रद्द करने के लिए स्वास्थ्य मंत्री अशोक भट्ट से भिड़ गए थे। आज भले ही उनके गृहनगर वडनगर में काफी विकास हो रहा हो लेकिन उन्होंने पूरे राज्य को एक नजर से देखा।
--आईएएनएस
एसडी/पीएम
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