जयपुर, 8 सितंबर (आईएएनएस)। सामान्य वर्ग की यूजीसी से जुड़ी मांगों के लिए काम करने वाले एक सामाजिक संगठन ने राजस्थान के निकाय चुनावों में एक अनोखी शर्त रखी है। संगठन चुनावी समर्थन देने से पहले उम्मीदवारों से 100 रुपए के नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर पर हलफनामा मांग रहा है।
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जयपुर, 8 सितंबर (आईएएनएस)। सामान्य वर्ग की यूजीसी से जुड़ी मांगों के लिए काम करने वाले एक सामाजिक संगठन ने राजस्थान के निकाय चुनावों में एक अनोखी शर्त रखी है। संगठन चुनावी समर्थन देने से पहले उम्मीदवारों से 100 रुपए के नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर पर हलफनामा मांग रहा है।
महिपाल मकराना के नेतृत्व वाले 'सवर्ण न्याय मंच' के बैनर तले यह मुहिम चलाई जा रही है और खबर है कि यह निकाय और स्थानीय निकाय चुनाव लड़ रहे 1,000 से ज्यादा उम्मीदवारों तक पहुंच चुकी है। संगठन का कहना है कि इन हलफनामों का मकसद यह पक्का करना है कि जिन उम्मीदवारों को उसका समर्थन मिले, वे चुनाव जीतने के बाद भी उसकी मांगों के प्रति प्रतिबद्ध रहें।
हालांकि, बहस इस बात पर छिड़ गई है कि हलफनामे में एक ऐसी शर्त है जो चुनाव प्रचार के दौरान किए जाने वाले वादों से कहीं आगे की बात लगती है। दस्तावेज के अनुसार, उम्मीदवारों को यह घोषणा करनी होगी कि पार्षद का चुनाव जीतने के बाद 'यूजीसी पैनल' यह तय करेगा कि वे किस राजनीतिक दल का समर्थन करेंगे। इस प्रावधान ने राजनीतिक हलकों में चर्चा छेड़ दी है क्योंकि यह चुनावी समर्थन को चुनाव के बाद लिए जाने वाले राजनीतिक फैसले से जोड़ता है।
संयोजक महिपाल मकराना ने कहा कि ये हलफनामे इसलिए लिए जा रहे हैं ताकि यह पक्का किया जा सके कि उम्मीदवार पद संभालने के बाद उन मुद्दों को न छोड़ें जिनके आधार पर उन्होंने समर्थन मांगा था।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब राजस्थान के निकाय चुनावों में पहले से ही कड़ी टक्कर, टिकट बंटवारे को लेकर नाराजगी और निर्दलीय व बागी उम्मीदवारों के मैदान में उतरने जैसी स्थितियां बनी हुई हैं।
मकराना ने कहा कि यूजीसी के मुद्दे पर 'सवर्ण न्याय मंच' के बैनर तले 1,000 से ज्यादा उम्मीदवारों को समर्थन दिया गया है। हम उनसे स्टाम्प पेपर पर हलफनामे पर दस्तखत करवा रहे हैं ताकि जीतने के बाद वे अपना पाला न बदलें।
आमतौर पर, चुनाव के समय समर्थन बैठकों, अपील, समुदाय के समीकरणों और ज़ुबानी वादों पर आधारित होता है। स्टाम्प-पेपर वाला हलफनामा एक अनोखी चीज है, एक लिखित भरोसा जो चुनाव प्रचार के बाद भी बना रहता है।
इस कदम से स्थानीय राजनीति के बदलते स्वरूप पर भी सवाल उठते हैं, जहां उम्मीदवार अब सिर्फ स्थापित राजनीतिक पार्टियों पर ही नहीं, बल्कि सामुदायिक समूहों, सामाजिक संगठनों और मुद्दों पर आधारित अभियानों पर भी तेजी से निर्भर होते जा रहे हैं।
'सवर्ण न्याय मंच' के लिए, इस हलफनामे को अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के एक तरीके के तौर पर पेश किया जा रहा है। हालांकि, उम्मीदवारों के लिए ऐसी शर्त को मानने के चुनाव के बाद राजनीतिक नतीजे भी हो सकते हैं।
इन हलफनामों की कोई कानूनी या बाध्यकारी अहमियत है या नहीं, यह एक अलग सवाल है। लेकिन राजनीतिक नजरिए से, ये राजस्थान के स्थानीय चुनावों की एक उभरती हुई सच्चाई को उजागर करते हैं: वोटों की लड़ाई अब चुनाव के बाद के वादों की लड़ाई भी बनती जा रही है।
--आईएएनएस
एमएस/
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