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रांची में वोटर लिस्ट को प्रामाणिक बनाने की चुनौतियों पर अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस, विशेषज्ञ बोले- तकनीक के साथ जमीनी सत्यापन जरूरी


रांची, 2 सितंबर (आईएएनएस)। हर पात्र नागरिक का नाम वोटर लिस्ट में शामिल हो और फर्जी या डुप्लीकेट नाम पूरी तरह बाहर रहें, इसके लिए आधुनिक तकनीक के साथ-साथ जमीनी स्तर पर सत्यापन बेहद जरूरी है। बढ़ते प्रवासन, तेजी से होते शहरीकरण और बदलती आबादी के बीच मतदाता सूची को हर पल अपडेट रखना आज एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी चुनौती को केंद्र में रखते हुए रांची में बुधवार को ‘वोटर रजिस्ट्रेशन एंड वोटर रजिस्टर-2026’ विषय पर दोदिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस शुरू हुआ।

रांची, 2 सितंबर (आईएएनएस)। हर पात्र नागरिक का नाम वोटर लिस्ट में शामिल हो और फर्जी या डुप्लीकेट नाम पूरी तरह बाहर रहें, इसके लिए आधुनिक तकनीक के साथ-साथ जमीनी स्तर पर सत्यापन बेहद जरूरी है। बढ़ते प्रवासन, तेजी से होते शहरीकरण और बदलती आबादी के बीच मतदाता सूची को हर पल अपडेट रखना आज एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी चुनौती को केंद्र में रखते हुए रांची में बुधवार को ‘वोटर रजिस्ट्रेशन एंड वोटर रजिस्टर-2026’ विषय पर दोदिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस शुरू हुआ।

झारखंड के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय और केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड की संयुक्त मेजबानी में यह कॉन्फ्रेंस नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (एनयूएसआरएल), रांची में आयोजित हो रहा है। भारत निर्वाचन आयोग के प्रधान सचिव अरविंद आनंद उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के रवि कुमार ने कहा कि सम्मेलन का मकसद विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) तक सीमित नहीं है। यहां मतदाता पंजीकरण और मतदाता सूची को लेकर देश-दुनिया के अनुभवों पर चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा कि निर्वाचन व्यवस्था में काम करने वाले लोगों के अनुभव और अकादमिक शोध को साथ लाने से मतदाता सूची को ज्यादा भरोसेमंद बनाया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि सम्मेलन के लिए 800 से ज्यादा विश्वविद्यालयों और संस्थानों से संपर्क किया गया था। 230 शोध सार मिले। इनमें से 80 को शॉर्टलिस्ट किया गया और 58 शोध-पत्रों को चर्चा और प्रकाशन के लिए चुना गया। पहले दिन पैनल चर्चा के अलावा छह तकनीकी सत्र हुए। इनमें एस्टोनिया, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, डेनमार्क, घाना और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों की मतदाता पंजीकरण व्यवस्था पर चर्चा हुई। ऑनलाइन पंजीकरण, डेटाबेस, नई तकनीक और मतदाता जागरूकता के तरीकों पर भी शोध प्रस्तुत किए गए। तकनीकी सत्रों में एक अहम मुद्दा प्रवासी मतदाताओं का रहा। काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले मजदूरों और अन्य प्रवासी आबादी के लिए मतदाता सूची में अपना नाम बनाए रखना और उसे समय पर अपडेट कराना चुनौती है। ग्रामीण और वंचित समुदायों, जनजातीय और सीमावर्ती इलाकों के लोगों तथा महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। सोशल मीडिया और बहुभाषी जागरूकता को मतदाता पंजीकरण से जोड़ने के तरीके भी सामने आए।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑनलाइन सिस्टम के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि तकनीक से काम आसान हो सकता है, लेकिन अंतिम फैसले में मानवीय जांच जरूरी रहेगी। एनयूएसआरएल के कुलपति प्रो (डॉ) अशोक आर पाटिल ने कहा कि मतदाता सूची लोकतांत्रिक भागीदारी का पहला कदम है। उन्होंने कहा कि एक तरफ हर पात्र व्यक्ति का नाम सूची में होना चाहिए, वहीं फर्जी, डुप्लीकेट और अपात्र नामों को रोकना भी जरूरी है।

केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड के कुलपति प्रो सारंग मेधेकर ने कहा कि निर्वाचन प्रशासन और विश्वविद्यालयों के बीच इस तरह का संवाद जरूरी है। नई तकनीक और एआई से निर्वाचन व्यवस्था में कई काम आसान हो सकते हैं, लेकिन इसके साथ डेटा की सुरक्षा और दूसरी चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा।

सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची के प्राचार्य डॉ. फादर रॉबर्ट प्रदीप कुजूर ने युवा मतदाताओं, प्रवासियों और वंचित वर्गों को निर्वाचन प्रक्रिया से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कॉलेज और विश्वविद्यालय मतदाता जागरूकता और पंजीकरण अभियान में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। सम्मेलन में सामने आने वाले प्रमुख निष्कर्षों को बाद में प्रिंट और डिजिटल रूप में प्रकाशित किया जाएगा। इससे मतदाता पंजीकरण और मतदाता सूची पर आगे होने वाले शोध और निर्वाचन प्रबंधन में मदद मिलने की उम्मीद है।

--आईएएनएस

एसएनसी/डीकेपी

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