Office Address

Address Display Here

Phone Number

+91-9876543210

Email Address

info@deshbandhu.co.in

राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत राजनारायण बसु की 200वीं जयंती पर संघ के सरकार्यवाह ने दी श्रद्धांजलि


नई दिल्ली, 3 नवंबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत, महान देशभक्त और समाज सुधारक राजनारायण बसु की 200वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि राजनारायण बसु ने भारतीय समाज में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव और आत्मसम्मान की भावना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

नई दिल्ली, 3 नवंबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत, महान देशभक्त और समाज सुधारक राजनारायण बसु की 200वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि राजनारायण बसु ने भारतीय समाज में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव और आत्मसम्मान की भावना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

सरकार्यवाह की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भारत का स्वतंत्रता संघर्ष देश के इतिहास का गौरवशाली अध्याय है। ब्रिटिश आक्रमण ने भारतीय शिक्षित समाज को उसकी सभ्यतागत जड़ों से दूर कर दिया था। ऐसे समय में कई महान व्यक्तित्वों ने राष्ट्रीय चेतना जगाने और देश की पहचान को स्पष्ट रूप से सामने रखने का प्रयास किया। इन महान विभूतियों में राजनारायण बसु का विशेष स्थान है।

राजनारायण बसु का जन्म 7 दिसंबर 1826 को बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बोराल गांव में हुआ था। इस वर्ष उनकी 200वीं जयंती मनाई जा रही है। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने संस्कृत स्कूल में अध्यापन का कार्य किया और अपना जीवन सामाजिक सुधार के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने गरीबों के उत्थान, नशे की प्रवृत्ति को समाप्त करने, महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने और विधवा पुनर्विवाह के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए। इस दिशा में उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने अपने भाई का विवाह एक विधवा से कराया था।

बयान के अनुसार, राजनारायण बसु ने शिक्षित वर्ग में राष्ट्रीय चेतना, आत्मगौरव और आत्मविश्वास की भावना विकसित करने के लिए लगातार काम किया। उनका मानना था कि इन गुणों के बिना किसी भी राष्ट्र का उत्थान संभव नहीं है। अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने 'प्रॉस्पेक्टस ऑफ ए सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ नेशनल फीलिंग' नाम से एक प्रारूप तैयार किया था।

उनके प्रयासों से 1867 में नबगोपाल मित्र द्वारा शुरू किया गया हिंदू मेला राष्ट्रीय चेतना के विकास और प्रसार का एक महत्वपूर्ण मंच बना। राजनारायण बसु ने इस मंच के माध्यम से स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल की वकालत की और स्वदेशी भावना को प्रोत्साहित किया। सरकार्यवाह ने कहा कि राजनारायण बसु मातृभाषा के इस्तेमाल पर विशेष जोर देते थे। उनका मानना था कि मातृभाषा आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। वह हिंदू धर्म को भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता का आधार मानते थे।

वर्ष 1873 में उन्होंने 'द सुपीरियरिटी ऑफ हिंदुइज्म' नामक पुस्तक लिखी, जिसमें हिंदू संस्कृति की दार्शनिक शक्ति और विशिष्टताओं को सामने रखा। उन्हें भारतीय राष्ट्रीय चेतना के पितामह के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जागरण के लिए 'महा हिंदू समिति' की परिकल्पना की थी। इस विचार को उन्होंने 1880 के दशक में प्रकाशित अपनी चर्चित पुस्तिका 'वृद्धा हिंदुर आशा' (एक वृद्ध हिंदू की आशा) में प्रस्तुत किया था।

बयान में यह भी उल्लेख किया गया कि राजनारायण बसु महर्षि श्री अरविंद के नाना थे। उनके विचारों और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का युवा अरविंद पर गहरा प्रभाव पड़ा था। रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता सहित भारतीय राष्ट्रीय पुनर्जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी कई महान विभूतियां उनका बहुत सम्मान करती थीं और उनके जीवन एवं विचारों से प्रेरणा लेती थीं।

सरकार्यवाह ने राजनारायण बसु को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनके विचार और दर्शन आज भी प्रासंगिक हैं। वे हमें आत्मगौरव, सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव और राष्ट्रीय एकता के महत्व की याद दिलाते हैं। राष्ट्र उनके योगदान के लिए सदैव कृतज्ञ रहेगा।

--आईएएनएस

डीएससी

Date & Time : 2026-11-03 21:55:02

Share:

Leave A Reviews

Related News