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सवाल उठाने वालों को 'दिमागी नक्सल' कहना असंवेदनशील तरीका : गीतांजलि अंगमो (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)


नई दिल्ली, 3 सितंबर (आईएएनएस)। मशहूर पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने 'दिमागी नक्सल' को लेकर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को 'दिमागी नक्सल' कहना, सवाल पूछने वाले व्यक्ति के बारे में बताने का बहुत असंवेदनशील तरीका है।

नई दिल्ली, 3 सितंबर (आईएएनएस)। मशहूर पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने 'दिमागी नक्सल' को लेकर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को 'दिमागी नक्सल' कहना, सवाल पूछने वाले व्यक्ति के बारे में बताने का बहुत असंवेदनशील तरीका है।

गीतांजलि अंगमो ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा, "निश्चित रूप से एक गुलाम मानसिकता है। क्योंकि हमारे सभी ढांचे (आर्थिक, शैक्षिक, भौतिकी, गणित, सब कुछ), जो भी प्रमेय (थ्योरम) के नाम हैं - जब 16वीं और 17वीं सदी में पुनर्जागरण हुआ, जब कई यूरोपीय वैज्ञानिकों, भौतिकविदों और दार्शनिकों ने अलग-अलग ढांचे पेश किए, तो भारत आज भी उन्हीं का पालन कर रहा है।"

उन्होंने आगे कहा, "हर कोई जानता है कि उस समय, जब यूरोप में पुनर्जागरण हो रहा था, तो हर विश्वविद्यालय में लोग संस्कृत भाषा का अध्ययन करते थे।"

गीतांजलि अंगमो ने कहा कि कई प्रमुख पश्चिमी विचारकों और वैज्ञानिकों ने भारतीय दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन किया था। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय अक्सर मूल स्रोतों से सीधे जुड़ने के बजाय दूसरों की ओर से पेश की गई व्याख्याओं के माध्यम से विचारों को स्वीकार करते थे।

उन्होंने दावा किया, "हम जानते हैं कि ओपेनहाइमर ने गीता पढ़ी, आइंस्टीन ने उपनिषद पढ़े, और प्लेटो व कई पश्चिमी दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने भारतीय ग्रंथों को पढ़ा, उनसे विचार लिए। लेकिन कई बार, उन्होंने उन्हें अपने सिद्धांतों के रूप में पेश किया और हमने उस दूसरे-हाथ वाले संस्करण को स्वीकार कर लिया। हमारे ग्रंथों को पढ़ने के बाद उन्होंने जो कहा, हमने उसे ही बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लिया।"

'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल पर उन्होंने कहा कि सवाल पूछना पारंपरिक रूप से भारतीय दार्शनिक सोच और शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

उन्होंने कहा, "मेरे लिए, किसी ऐसे व्यक्ति को 'दिमागी नक्सल' कहना जो सवाल पूछता है, बहुत असंवेदनशील तरीका है। हमारी अपनी परंपरा में पूछने या सवाल करने को कभी भी नकारात्मक नहीं माना गया है।"

उन्होंने कहा, "उपनिषदों में भी सवाल पूछने की एक निरंतर परंपरा रही है। नचिकेता यम से सवाल पूछते हैं। पूरी गीता में, अर्जुन कृष्ण से सवाल पूछते हैं। अर्जुन कभी-कभी कृष्ण के विचारों से असहमत भी होते हैं। तो हम अर्जुन को 'दिमागी नक्सल' नहीं कर सकते हैं।"

उन्होंने कहा, "क्योंकि सवाल पूछना हमारे शिक्षा सिस्टम का हिस्सा रहा है। सवाल पूछना अच्छी बात है। हां, मकसद मायने रखता है। कुछ बच्चे सचमुच उत्सुकता के कारण सवाल पूछते हैं, जबकि कुछ बच्चे किसी और मकसद से ऐसा कर सकते हैं। इसलिए, सवाल पूछना गलत नहीं है। हमें सवाल के पीछे के मकसद पर ध्यान देना चाहिए।"

--आईएएनएस

डीसीएच/

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