
नई दिल्ली. सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर 'फर्जी और भ्रामक' सामग्री को नियंत्रित करने वाले संशोधित आईटी नियमों (IT Rules) को रद्द करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी है। हालांकि, केंद्र सरकार के लिए यह एक आंशिक झटका है क्योंकि शीर्ष अदालत ने फिलहाल हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है, जिसने इन नियमों को असंवैधानिक करार दिया था।
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की तीन सदस्यीय पीठ ने की। अदालत ने इस मामले के मूल याचिकाकर्ताओं—स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (EGI) और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स (AIM)—को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है। पीठ ने टिप्पणी की कि इस विवाद का स्थायी और अंतिम समाधान जल्द से जल्द निकलना आवश्यक है, इसीलिए कोर्ट ने जल्दबाजी में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक नहीं लगाई।
बता दें कि 26 सितंबर 2024 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए संशोधित आईटी नियमों को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि ये नियम असंवैधानिक हैं। अदालत का मानना था कि सरकार से जुड़ी सूचनाओं की सत्यता की जांच करने वाली 'फैक्ट चेक यूनिट' (FCU) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है। इसी फैसले को केंद्र ने अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि इन नियमों का उद्देश्य किसी कंटेंट को पूरी तरह से ब्लॉक करना या अभिव्यक्ति की आजादी छीनना नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार का प्राथमिक लक्ष्य सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने वाली गलत और भ्रामक जानकारियों को नियंत्रित करना है। ये संशोधन 6 अप्रैल 2023 को 'सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021' के तहत पेश किए गए थे।
इन संशोधित नियमों के केंद्र में फैक्ट चेक यूनिट (FCU) की स्थापना थी। इस इकाई को अधिकार दिया गया था कि वह सोशल मीडिया पर सरकार से संबंधित किसी भी ऐसी सामग्री की पहचान करे जो 'फर्जी, गलत या भ्रामक' हो। नियमों के मुताबिक, यदि FCU किसी सामग्री को गलत करार देती, तो संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को या तो उस कंटेंट को हटाना होता या उस पर चेतावनी (डिस्क्लेमर) लगानी होती। ऐसा न करने की स्थिति में प्लेटफॉर्म्स को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा (Safe Harbour) खत्म हो जाती और उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता।
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