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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी, न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाना गलत, बंगाल मतदाता सूची विवाद में अपीलीय न्यायाधिकरण बनाने के निर्देश

नई दिल्ली. सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली ममता बनर्जी और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने न केवल चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 'अपीलीय न्यायाधिकरण' के गठन का आदेश दिया, बल्कि याचिकाकर्ताओं द्वारा न्यायिक प्रणाली पर संदेह व्यक्त करने पर तीखी नाराजगी भी जताई।

अपीलीय न्यायाधिकरण का होगा गठन

न्यायालय ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया है कि वह कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ परामर्श कर एक अपीलीय न्यायाधिकरण गठित करने के लिए अधिसूचना जारी करे।

  • संरचना: इस न्यायाधिकरण में एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश शामिल होंगे।

  • कार्य: यह उन मामलों की अपील सुनेगा जहाँ न्यायिक अधिकारियों द्वारा मतदाता सूची से संबंधित आवेदन खारिज कर दिए गए हैं।

  • पारदर्शिता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई न्यायिक अधिकारी आवेदन अस्वीकार करता है, तो उसे इसके स्पष्ट कारण बताने होंगे। इस पूरी प्रक्रिया का खर्च चुनाव आयोग द्वारा वहन किया जाएगा।

पेंडिंग मामलों पर विरोधाभासी आंकड़े

सुनवाई के दौरान आंकड़ों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने बताया कि कुल 63 लाख मामलों में से अब तक केवल 7 लाख का निपटारा हुआ है और 57 लाख मामले लंबित हैं।

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने इस पर स्पष्टता देते हुए कहा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से प्राप्त जानकारी (10 मार्च तक) के अनुसार, 10 लाख से अधिक आपत्तियों का निपटारा पहले ही किया जा चुका है।

अदालत की कड़ी फटकार और अवमानना की चेतावनी

न्यायालय ने याचिका की भाषा और न्यायिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठाए गए सवालों पर गहरा असंतोष व्यक्त किया।

"न्यायिक अधिकारियों के कामकाज को चुनौती देना व्यवस्था में अविश्वास दर्शाता है और समाज में गलत संदेश देता है।" - सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस सूर्यकांत ने चिंता जताते हुए कहा कि दावों के विरोधाभास के कारण अदालत को दोनों पक्षों पर संदेह होने लगा है। पीठ ने यहाँ तक कहा कि वह इस आवेदन पर अवमानना नोटिस जारी करने पर विचार कर रही है और याचिकाकर्ताओं को चेतावनी दी कि उन्हें उनके द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा में ही जवाब दिया जा सकता है।

बचाव में क्या कहा गया?

मेनका गुरुस्वामी ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं का इरादा न्यायिक अधिकारियों की निष्ठा पर सवाल उठाना नहीं था। उन्होंने स्वीकार किया कि इस तरह के संदेह पैदा करना वास्तव में चौंकाने वाला विषय है।

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