नई दिल्ली, 26 अगस्त (आईएएनएस)। रसोई में खट्टापन घोलने वाली इमली सिर्फ स्वाद नहीं बढ़ाती, बल्कि सेहत का खजाना भी है। टैमारिंडस इंडिका वैज्ञानिक नाम वाली इमली में विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट, फाइबर और आयरन भरपूर मात्रा में होते हैं। आयुर्वेद में इसे पाचन, कब्ज और पित्त दोष के लिए रामबाण माना गया है।
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नई दिल्ली, 26 अगस्त (आईएएनएस)। रसोई में खट्टापन घोलने वाली इमली सिर्फ स्वाद नहीं बढ़ाती, बल्कि सेहत का खजाना भी है। टैमारिंडस इंडिका वैज्ञानिक नाम वाली इमली में विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट, फाइबर और आयरन भरपूर मात्रा में होते हैं। आयुर्वेद में इसे पाचन, कब्ज और पित्त दोष के लिए रामबाण माना गया है।
नमामि गंगे ने एक्स पोस्ट माध्यम से बताया कि इमली की उत्पत्ति उष्णकटिबंधीय अफ्रीका मानी जाती है, लेकिन यह भारत में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। यह दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका तथा अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से वितरित है। भारत में यह मैदानी एवं पठारी क्षेत्रों में विशेष रूप से सामान्य है।
इमली का जैव-भौगोलिक क्षेत्र दक्कन प्रायद्वीप, मध्य उच्चभूमि, गंगा का मैदानी क्षेत्र, पूर्वी एवं पश्चिमी घाट, अर्ध-शुष्क एवं शुष्क है। इसका वृक्ष बड़ा, दीर्घायु एवं सदाबहार से अर्ध-सदाबहार होता है।
इमली उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में शुष्क से लेकर आर्द्र जलवायु तक अच्छी तरह विकसित होती है। यह विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उग सकती है, किंतु अच्छी जल निकासी वाली दोमट एवं बलुई-दोमट मिट्टी में सर्वोत्तम वृद्धि करती है। यह सूखा एवं उच्च तापमान सहन करने की क्षमता रखती है।
इमली भारत में प्राचीन काल से प्राकृतिक रूप से है। इमली का फूल अप्रैल – जून के बीच आता है, जबकि फल दिसंबर–अप्रैल के बीच में आता है।
इमली के घने वृक्ष पक्षियों, गिलहरियों एवं अन्य छोटे वन्यजीवों को आश्रय प्रदान करते हैं, जबकि इसके फल अनेक जीवों के भोजन का स्रोत होते हैं। इसकी विस्तृत जड़ प्रणाली मिट्टी के कटाव को कम करने तथा कार्बन अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह वृक्ष शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में उत्कृष्ट छायादार वृक्ष के रूप में भी महत्वपूर्ण है।
इमली के गूदे का उपयोग भोजन, पेय पदार्थ, चटनी, अचार तथा विभिन्न व्यंजनों में खट्टे स्वाद के लिए किया जाता है। इसके फल विटामिन एवं खनिजों से भरपूर होते हैं। पत्तियों, छाल एवं फल का उपयोग आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा में पाचन, ज्वर तथा अन्य रोगों के उपचार में किया जाता है। इसकी कठोर एवं टिकाऊ लकड़ी का उपयोग कृषि उपकरण, फर्नीचर, हस्तशिल्प एवं ईंधन के रूप में किया जाता है।
--आईएएनएस
ओपी/एएस
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