
धर्म डेस्क. हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री का व्रत रखा जाता है। यह व्रत केवल एक उपवास नहीं, बल्कि सावित्री के उस अटूट संकल्प का प्रतीक है, जिसने यमराज के हाथों से भी अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। यदि आप 'न्यूली वेडेड' हैं और पहली बार बरगद की पूजा करने जा रही हैं, तो इन नियमों का पालन करना आपके लिए अनिवार्य है ताकि आपकी पूजा सफल हो।
पूजा की शुरुआत सूर्योदय से पहले यानी ब्रह्म मुहूर्त में जागने से होती है। स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर शुद्धिकरण करें। इसके बाद हाथ में थोडा जल और अक्षत लेकर संकल्प लें कि आप अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति के लिए यह व्रत पूरी श्रद्धा से रखेंगी।
शास्त्रों में पहली बार व्रत रखने वाली महिला के लिए नई दुल्हन की तरह सजने का विधान है।
परिधान: लाल, पीला, गुलाबी या नारंगी रंग के वस्त्र पहनें। काला और नीला रंग अशुभ माना जाता है, इसलिए इनसे बचें।
श्रृंगार: हाथों में गहरी रची मेहंदी, माथे पर लंबा सिंदूर और पैरों में महावर (आलता) जरूर लगाएं। यह आपके अखंड सौभाग्य का प्रतीक है।
बरगद के पेड़ में साक्षात त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का वास माना जाता है।
पूजा स्थल: किसी पुराने और पूजनीय वट वृक्ष के पास जाएं। यदि संभव न हो, तो घर में गमले में वट की टहनी लगाकर भी पूजन किया जा सकता है।
परिक्रमा: कच्चा सूत लेकर पेड़ के चारों ओर परिक्रमा करें। पहली बार में 7, 11 या सामर्थ्य अनुसार 108 बार परिक्रमा करना उत्तम माना जाता है।
अपनी बांस की टोकरी को व्यवस्थित करें। इसमें भीगे चने, सात तरह के अनाज (सप्तधान्य), धूप-दीप, कलावा और मौसमी फल (जैसे आम और लीची) रखें। पूजा के समय सावित्री-सत्यवान की कथा जरूर सुनें, क्योंकि इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
इस व्रत में भीगे हुए चने का विशेष महत्व है। पूजा के बाद चने के कुछ दानों को निगलकर व्रत शुरू करने की भी परंपरा है। पूजा संपन्न होने पर अपनी सास या घर की वरिष्ठ सुहागिन महिलाओं को सुहाग सामग्री (सुहाग पिटारी) भेंट करें और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें।
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