नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी पहल की गई है। इस पहल के अंतर्गत वायुसेना को सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड हथियारों की आपूर्ति की जाएगी। दरअसल, सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड हथियार एक हवा से जमीन पर मार करने वाला सटीक निर्देशित ग्लाइड बम है। इसे भारतीय वायुसेना के जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमानों से दागा जा सकता है।
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नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी पहल की गई है। इस पहल के अंतर्गत वायुसेना को सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड हथियारों की आपूर्ति की जाएगी। दरअसल, सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड हथियार एक हवा से जमीन पर मार करने वाला सटीक निर्देशित ग्लाइड बम है। इसे भारतीय वायुसेना के जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमानों से दागा जा सकता है।
रक्षा मंत्रालय ने बुधवार को 160 सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड हथियारों की खरीद के लिए करार किया है। 810.79 करोड़ रुपए की लागत का यह समझौता भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के साथ किया है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, यह समझौता ‘भारतीय खरीद, स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित’ श्रेणी के तहत हुआ है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में बुधवार को नई दिल्ली में समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
बता दें कि सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड हथियारों खासियत यह है कि ये लंबी दूरी से दुश्मन के एयरफील्ड को निशाना बनाने की क्षमता रखता है। यानी विमान को लक्ष्य के बिल्कुल पास जाने की जरूरत नहीं होगी। दूर से ही लड़ाकू अपने लक्ष्य को निशाना बना सकते हैं। इस हथियार को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित किया है। इसमें 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होगी। इसके साथ ही कई महत्वपूर्ण उप-प्रणालियों को भी देश में ही विकसित और स्वदेशी रूप से बनाया जाएगा। इनमें इनिशियल मेजरमेंट यूनिट, लॉन्ग इम्पैक्ट डिले फ्यूज और ट्विन स्टोर कैरियर शामिल हैं।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन हथियारों की आपूर्ति 2027-28 और 2028-29 के दौरान की जाएगी। वायुसेना में इनके शामिल होने से लंबी दूरी से सटीक हमले की क्षमता को मजबूती मिलेगी। इससे वायुसेना को अपने अभियान बिना रुकावट जारी रखने में मदद मिलेगी और देश की रक्षा तैयारियों को भी बढ़ावा मिलेगा।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह करार केवल वायुसेना की क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें स्वदेशी डिजाइन, विकास और उत्पादन पर जोर दिया गया है। इससे देश में रक्षा उपकरणों के निर्माण और महत्वपूर्ण तकनीकों के स्वदेशीकरण को भी बढ़ावा मिलेगा।
बता दें कि इसी महीने रक्षा मंत्रालय ने सशस्त्र बलों की क्षमता बढ़ाने के लिए करीब 1.10 लाख करोड़ रुपए की रक्षा खरीद को भी सैद्धांतिक मंजूरी दी थी। तब थलसेना के लिए रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु टोही वाहन की मंजूरी दी गई थी। नौसेना के लिए आधुनिक निगरानी ‘अरुध्रा रडार’ खरीदने को स्वीकृति दी गई। वहीं वायुसेना के लड़ाकू विमानों की युद्धक क्षमता बढ़ाने से जुड़े कई प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे।
रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डीएसी की इस मंजूरी के बाद सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए कई अहम हथियारों, वाहनों, रडार और सैन्य प्रणालियों की खरीद का रास्ता साफ हुआ। वहीं अब सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड हथियारों के लिए किए गए समझौते से देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूती मिली है।
--आईएएनएस
जीसीबी/डीकेपी
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