
वाशिंगटन /नई दिल्ली. अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति और वैश्विक व्यापारिक गलियारों से एक बेहद बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उस बहुचर्चित और बेहद कड़े विधेयक पर आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसके कानून बनने के बाद अब रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ 100% तक भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है. इस नए अमेरिकी कानून के अस्तित्व में आने से ग्लोबल मार्केट में हड़कंप मच गया है, और इसके प्रभावस्वरूप भारत के लिए भी बड़ी आर्थिक चुनौतियां खड़ी होती नजर आ रही हैं.
क्या है नया अमेरिकी कानून और इसकी मुख्य बातें?
इस नए, कड़े और प्रतिबंधात्मक अमेरिकी कानून को आधिकारिक तौर पर 'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' (Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act) नाम दिया गया है. इस कानून के प्रावधानों और इसे मिली विधायी मंजूरी के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
संसदीय मंजूरी की प्रक्रिया: इस कड़े विधेयक को अमेरिकी संसद के उच्च सदन यानी सीनेट से पहले ही हरी झंडी मिल चुकी थी. इसके बाद अमेरिकी संसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' में भी भारी बहुमत (262 के मुकाबले 159 वोटों से) के साथ इसे पारित कर दिया गया था. अब राष्ट्रपति के अंतिम हस्ताक्षर होने के बाद यह औपचारिक रूप से कानून का रूप ले चुका है.
100% टैरिफ का प्रावधान: इस नए कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को व्यापक और सख्त अधिकार मिल गए हैं कि वे रूस से सबसे अधिक मात्रा में कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस आयात करने वाले दुनिया के शीर्ष 5 देशों से आने वाले तमाम उत्पादों और सामान पर 100% तक का अतिरिक्त शुल्क थोप सकते हैं.
अन्य कड़े प्रतिबंध: ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों पर शिकंजा कसने के साथ-साथ यह कानून रूस के उन जहाजों (जिन्हें 'शैडो फ्लीट' या छाया बेड़ा कहा जाता है) को भी विशेष रूप से निशाना बनाता है, जो पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों को दरकिनार कर अंतरराष्ट्रीय समुद्रों में तेल की ढुलाई करते हैं.
भारत के लिए क्यों और कैसे बढ़ सकती हैं मुश्किलें?
रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहराया था, तब भारत ने अपनी घरेलू ऊर्जा सुरक्षा और किफायती दरों को सर्वोपरि रखते हुए रूस से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) का आयात रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ा लिया था.
बढ़ती ऊर्जा निर्भरता: वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का 40% से अधिक क्रूड ऑयल अकेले रूस से आयात कर रहा है. पिछले कुछ वित्त वर्षों में भारत ने अरबों डॉलर का कच्चा तेल रूस से खरीदा है, जो देश के कुल तेल आयात का लगभग एक तिहाई या उससे भी बड़ा हिस्सा है.
शीर्ष देशों की सूची में भारत का नाम: जानकारों के मुताबिक, रूस से सबसे ज्यादा ऊर्जा आयात करने वाले प्रमुख देशों में चीन के बाद भारत का नाम सबसे आगे माना जाता है. ऐसे में, यदि अमेरिकी प्रशासन इस नए कानून के तहत दंडात्मक कदम उठाते हुए इन शीर्ष 5 देशों पर शिकंजा कसता है, तो अमेरिका को होने वाला भारतीय निर्यात सीधे तौर पर प्रभावित होगा और भारतीय उत्पादों पर 100% तक का भारी टैरिफ लग सकता है. इससे भारतीय अर्थव्यवस्था और अमेरिकी बाजार में हमारे निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
भारत सरकार का कूटनीतिक और स्पष्ट रुख
इस पूरे घटनाक्रम और अमेरिकी प्रतिबंधों की आहट पर भारत सरकार ने पहले ही अपना रुख बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है. नई दिल्ली का साफ कहना है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और 1.4 अरब देशवासियों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है, और इसमें किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा.
भारतीय विदेश मंत्रालय और प्रमुख व्यापार विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और देश के आर्थिक हितों तथा व्यापारिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हरसंभव कूटनीतिक और व्यावहारिक कदम उठाए जाएंगे. हालांकि, इस नए अमेरिकी कानून के धरातल पर उतरने से भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों पर एक नया और गहरा दबाव जरूर बन गया है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं.
Leave A Reviews