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विष्णु दिगंबर पलुस्कर : हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साधक, राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को किया स्वरबद्ध


नई दिल्ली, 20 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय संगीत की दुनिया में 21 अगस्त वह तारीख है, जब सुर, साधना और शानदार आवाज का एक दौर खामोश हो गया। उस युग पुरुष का नाम पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर है, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायक और संगीतज्ञ थे।

नई दिल्ली, 20 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय संगीत की दुनिया में 21 अगस्त वह तारीख है, जब सुर, साधना और शानदार आवाज का एक दौर खामोश हो गया। उस युग पुरुष का नाम पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर है, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायक और संगीतज्ञ थे।

विष्णु दिगंबर पलुस्कर का जन्म 18 अगस्त 1872 को महाराष्ट्र के कुरुंदवाड़ में हुआ था। उनके पिता दिगंबर गोपाल उस समय के एक प्रसिद्ध कीर्तनकार थे और माता का नाम गंगा देवी था। बचपन में ही पलुस्कर के साथ एक ऐसी दुर्घटना हुई, जिसमें उनकी आंखों की रोशनी चली गई।

दरअसल, बचपन में दीपावली की आतिशबाजी के दौरान पास में एक पटाखा फटने से उनकी आंखों की रोशनी चली गई। इसके बाद वह आंखों का इलाज कराने के लिए बगल के ही राज्य चले गए।

मिराज में इलाज के लिए जाने के बाद उनकी रुचि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बढ़ी। उन्होंने पंडित बालकृष्ण से ग्वालियर घराने की कठोर संगीत शिक्षा ली। 12 वर्षों की निरंतर शिक्षा और लगातार अभ्यास के बाद पलुस्कर के लिए संगीत उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया।

विष्णु दिगंबर पलुस्कर एक ऐसे भव्य व्यक्तित्व थे, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को जन-जन तक पहुंचाने और उसे सम्मानित स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने 1901 में लाहौर में गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना की। बाद में उन्होंने इसकी शाखा मुंबई (तब बंबई) में भी खोली।

उनके कुछ लोकप्रिय भजनों की बात करें तो उन्होंने प्रसिद्ध राम भजन 'रघुपति राघव राजाराम' का मूल संस्करण गाया और राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को स्वरबद्ध किया। बहुत कम लोग जानते होंगे कि विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने ही राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को आज के प्रचलित शास्त्रीय स्वर में ढाला। इसके अलावा, उन्होंने संगीत पर लगभग 50 पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'संगीत बाल-बोध' और 'महिला संगीत' प्रमुख हैं।

विष्णु दिगंबर पलुस्कर का निधन उनके 59वें जन्मदिन के मात्र तीन दिन बाद, 21 अगस्त 1931 को हुआ, लेकिन उनकी रचनाएं और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उनका योगदान सदैव के लिए अमर हो गया।

--आईएएनएस

डीके/एबीएम

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