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विश्व हेपेटाइटिस दिवस पर एम्स के विशेषज्ञों की चेतावनी, लिवर की बीमारी को हल्के में न लें


नई दिल्ली, 28 जुलाई (आईएएनएस)। विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने वायरल हेपेटाइटिस, फैटी लिवर और शराब से होने वाली लिवर संबंधी बीमारियों को लेकर लोगों को सतर्क रहने की अपील की। विशेषज्ञों ने कहा कि हेपेटाइटिस की समय पर पहचान, नियमित जांच और उचित इलाज से गंभीर जटिलताओं और मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, 2024 में दुनियाभर में वायरल हेपेटाइटिस के कारण लगभग 13 लाख लोगों की मौत हुई, जो इस बीमारी की गंभीरता को दर्शाता है।

नई दिल्ली, 28 जुलाई (आईएएनएस)। विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने वायरल हेपेटाइटिस, फैटी लिवर और शराब से होने वाली लिवर संबंधी बीमारियों को लेकर लोगों को सतर्क रहने की अपील की। विशेषज्ञों ने कहा कि हेपेटाइटिस की समय पर पहचान, नियमित जांच और उचित इलाज से गंभीर जटिलताओं और मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, 2024 में दुनियाभर में वायरल हेपेटाइटिस के कारण लगभग 13 लाख लोगों की मौत हुई, जो इस बीमारी की गंभीरता को दर्शाता है।

एम्स के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. प्रमोद गर्ग ने बताया कि हेपेटाइटिस एक सामान्य शब्द है, जिसका अर्थ है लिवर में सूजन या इंफ्लेमेशन। इसके तीन प्रमुख कारण हैं, वायरल संक्रमण, अत्यधिक शराब का सेवन और फैटी लिवर डिजीज। उन्होंने बताया कि हेपेटाइटिस ए और ई वायरस आमतौर पर एक्यूट संक्रमण करते हैं, जिसमें कुछ ही सप्ताह में भूख कम लगना, उल्टी, पीलिया और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं। वहीं, हेपेटाइटिस बी और सी वायरस लंबे समय तक शरीर में बने रहते हैं और क्रोनिक हेपेटाइटिस का कारण बनते हैं, जो आगे चलकर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में बदल सकते हैं।

डॉ. गर्ग ने कहा कि भारत में शराब के बढ़ते सेवन के कारण अल्कोहलिक हेपेटाइटिस और सिरोसिस के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही फैटी लिवर डिजीज आज एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभर रही है। मोटापा, डायबिटीज, शारीरिक गतिविधियों की कमी, लंबे समय तक बैठे रहने की आदत और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड व अधिक कैलोरी वाले भोजन का बढ़ता चलन फैटी लिवर के प्रमुख कारण हैं।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि फैटी लिवर को मामूली बीमारी समझना बड़ी भूल हो सकती है। लंबे समय तक इलाज न होने पर यह स्टेआटोहेपेटाइटिस, सिरोसिस और अंततः लिवर कैंसर का कारण बन सकता है। पहले जहां लिवर कैंसर मुख्य रूप से हेपेटाइटिस बी और सी के मरीजों में देखा जाता था, वहीं अब फैटी लिवर के मरीजों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं।

फैटी लिवर के शुरुआती संकेतों के बारे में डॉ. गर्ग ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का वजन लगातार बढ़ रहा है, पेट बाहर निकल रहा है या मोटापा बढ़ रहा है, तो यह फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था का संकेत हो सकता है। हालांकि, इस बीमारी के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। कुछ मरीजों को हल्की पेट की जलन, अपच, खाने के बाद भारीपन, हल्का दर्द या उल्टी जैसा महसूस हो सकता है। इसकी पुष्टि अल्ट्रासाउंड और रक्त जांच से की जाती है।

डब्ल्यूएचओ द्वारा वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस के उन्मूलन के लक्ष्य पर डॉ. गर्ग ने कहा कि यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए हेपेटाइटिस बी और सी की समय पर जांच और इलाज बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत में संक्रमण के मामलों में कमी आई है, लेकिन अभी बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं।

एम्स गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के प्रो. डॉ. शालिमार ने हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए टीकाकरण को सबसे प्रभावी उपाय बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत जन्म के 12 से 24 घंटे के भीतर बच्चे को पहली डोज दी जाती है। इसके बाद एक महीने और छह महीने पर दो अतिरिक्त डोज लगाने से लगभग 95 प्रतिशत से अधिक सुरक्षा मिलती है। तीनों डोज पूरी होने पर हेपेटाइटिस बी संक्रमण का खतरा बेहद कम रह जाता है।

डॉ. शालिमार ने हेपेटाइटिस बी के इलाज में एक नई उम्मीद का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि हाल ही में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय ट्रायल में एक नए मॉलिक्यूल ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। अब तक उपलब्ध दवाइयां केवल वायरस को नियंत्रित करती थीं, लेकिन शरीर से पूरी तरह खत्म नहीं कर पाती थीं। नई दवा के 72 सप्ताह तक उपयोग के बाद करीब 20 प्रतिशत मरीजों में वायरस पूरी तरह समाप्त होने की संभावना देखी गई है। उन्होंने इसे हेपेटाइटिस बी के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए उम्मीद जताई कि यह दवा जल्द भारत में भी उपलब्ध होगी।

--आईएएनएस

पीएसके/वीसी

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