
मंडीदीप (रायसेन). मध्य प्रदेश की प्रमुख इंडस्ट्रियल सिटी और सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में शुमार मंडीदीप इस समय अभूतपूर्व और भीषण जलसंकट (Water Crisis) के दौर से गुजर रहा है। देश-दुनिया के बड़े उद्योगों को समेटने वाले इस शहर के नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि शहर के कई वार्डों में लोगों को 6 से 8 दिन के लंबे अंतराल में पानी मिल रहा है। इस तपती और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के बीच, रहवासी रात-रात भर जागकर नलों में पानी आने का इंतजार करने को मजबूर हैं। वहीं, नगर पालिका की टैंकर व्यवस्था पूरी तरह से घुटने टेक चुकी है।
इस पूरे जलसंकट की सबसे चौंकाने वाली और गंभीर बात यह है कि इसका सबसे ज्यादा असर उन वार्डों (जैसे वार्ड क्रमांक 5) में दिखाई दे रहा है, जो स्वयं नगर पालिका अध्यक्ष का मुख्य प्रभाव क्षेत्र माना जाता है।
स्थानीय नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा है और उनका कहना है:
"जब स्वयं नपाध्यक्ष के अपने वार्ड के नागरिक पानी के एक-एक घड़े के लिए दर-दर भटक रहे हैं, तो बाकी पूरे शहर की स्थिति कितनी भयावह होगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। अब केवल आश्वासनों से प्यास नहीं बुझेगी। अगर जल्द ही नियमित सप्लाई शुरू नहीं हुई, तो हम नपाध्यक्ष के निवास का घेराव कर उग्र आंदोलन करेंगे।"
मंडीदीप नगरीय क्षेत्र में पानी को लेकर मचे हाहाकार के बाद रोज वार्डों के नागरिक नगर पालिका कार्यालय पहुंचकर उग्र प्रदर्शन और नारेबाजी कर रहे हैं। स्थिति को संभालने में प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं:
एजेंसी ने हाथ खड़े किए: शहर में टैंकरों के जरिए पानी सप्लाई करने वाली इंदौर की निजी एजेंसी ने हाथ खड़े कर दिए हैं।
'ऊंट के मुंह में जीरा' साबित हो रही व्यवस्था: नगर पालिका अब अपनी साख बचाने के लिए 35 हजार लीटर की क्षमता वाले 3 बड़े टैंकरों से चार मुख्य सम्पवेलों (Sumpwells) में पानी डलवा रही है। इसके अलावा, करीब एक दर्जन ट्रैक्टर-टैंकरों को प्रभावित इलाकों में भेजा जा रहा है, जो शहर की आबादी को देखते हुए 'ऊंट के मुंह में जीरा' साबित हो रहे हैं। पानी लूटने की होड़ में रोजाना मोहल्लों में खूनी विवाद और झगड़े हो रहे हैं।
गिरता वाटर लेवल: मंडीदीप में लगातार गिरते भू-जल स्तर (Ground Water Level) ने इस संकट की आग में घी डालने का काम किया है।
मंडीदीप के प्रबुद्ध और वरिष्ठ नागरिकों का आरोप है कि इस भीषण जलसंकट के स्पष्ट संकेत फरवरी और मार्च के महीने से ही मिलने शुरू हो गए थे। शहर के अधिकांश बोरवेल गर्मी शुरू होने से पहले ही जवाब देने लगे थे। इसके बावजूद, नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों और इंजीनियरों ने समय रहते कोई ठोस बैकअप प्लान या कार्ययोजना (Action Plan) तैयार नहीं की।
यदि समय रहते नए ट्यूबवेल खोदे जाते, वैकल्पिक जल स्रोतों को जोड़ा जाता और पुराने कुएं-बावड़ियों का जीर्णोद्धार किया जाता, तो आज उद्योगों को पानी देने वाले शहर की जनता इस तरह प्यासी न मरती। करोड़ों रुपये की जल आवर्धन योजनाओं के दावों के बीच, धरातल पर टैंकर के पीछे भागती जनता नगर पालिका के भ्रष्टाचार और नाकामी की कहानी खुद बयां कर रही है।
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