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योग केवल आसन नहीं : यम और नियम के बिना अधूरी है साधना


नई दिल्ली, 2 नवंबर (आईएएनएस)। आजकल लोग खुद को फिट और तनावमुक्त रखने के लिए योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि योग का असली मतलब सिर्फ शारीरिक अभ्यास करना नहीं है? योग एक ऐसी जीवनशैली है, जो हमें शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ अपने व्यवहार, विचारों और आदतों को बेहतर बनाना भी सिखाती है। योग साधना में यम और नियम का विशेष महत्व है। इनके बिना योग को पूरी तरह समझना मुश्किल है।

नई दिल्ली, 2 नवंबर (आईएएनएस)। आजकल लोग खुद को फिट और तनावमुक्त रखने के लिए योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि योग का असली मतलब सिर्फ शारीरिक अभ्यास करना नहीं है? योग एक ऐसी जीवनशैली है, जो हमें शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ अपने व्यवहार, विचारों और आदतों को बेहतर बनाना भी सिखाती है। योग साधना में यम और नियम का विशेष महत्व है। इनके बिना योग को पूरी तरह समझना मुश्किल है।

योग दर्शन में यम और नियम को योग के शुरुआती दो अंग माना गया है। ये व्यक्ति के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन को अनुशासित बनाने के सिद्धांत हैं। जहां यम हमें दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह सिखाता है, वहीं नियम हमें अपने जीवन और आदतों को बेहतर बनाने की प्रेरणा देते हैं।

यम के पांच प्रमुख सिद्धांत हैं। पहला है अहिंसा, जिसका मतलब है किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से चोट न पहुंचाना। यह हमें दूसरों के प्रति दया और प्रेम का भाव रखने की सीख देता है। दूसरा सिद्धांत सत्य है, यानी हमेशा सच बोलना और अपने विचारों व व्यवहार में ईमानदारी बनाए रखना। तीसरा है अस्तेय, जिसका अर्थ चोरी न करना है। इसमें किसी की वस्तु के साथ-साथ उसके अधिकार और समय का गलत इस्तेमाल न करना भी शामिल है। चौथा सिद्धांत ब्रह्मचर्य है, जो हमें अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने और जीवन में संयम बनाए रखने की प्रेरणा देता है। वहीं, पांचवां सिद्धांत अपरिग्रह है। इसका मतलब जरूरत से ज्यादा चीजों का संग्रह न करना और लालच से दूर रहना है।

यम के बाद नियम का स्थान आता है। इसके भी पांच प्रमुख सिद्धांत हैं। पहला है शौच, यानी शरीर, मन और आसपास के वातावरण को साफ-सुथरा रखना। दूसरा है संतोष, जो हमें अपनी उपलब्धियों के प्रति आभार रखने और बेवजह की इच्छाओं से बचने की सीख देता है। तीसरा सिद्धांत स्वाध्याय है। इसका अर्थ अच्छे ग्रंथों का अध्ययन करना और सही ज्ञान प्राप्त करके खुद को बेहतर बनाना है। चौथा है तप, यानी अनुशासन, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना। पांचवां सिद्धांत ईश्वर प्रणिधान है, जिसका मतलब अपने कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करना और जीवन में विश्वास बनाए रखना है।

--आईएएनएस

पीआईएम/एएस

Date & Time : 2026-11-02 11:05:05

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