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योग में विशेष है 'महामुद्रा' का महत्व, शरीर ही नहीं मन को भी रखता है स्वस्थ


नई दिल्ली, 31 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय परंपरा में योगासन, प्राणायम और मुद्राओं का विशेष महत्व दिया गया है। यह शरीर को शारीरिक स्वस्थ्य रखने के साथ-साथ मन को एकाग्र, शांत और संतुलित बनाने में मदद करता है। योग की विभिन्न मुद्राओं में 'महामुद्रा' भी अपना विशेष स्थान रखता है। यह शरीर को स्वस्थ्य रखता है और तंत्रिका तंत्र को संतुलति व ऊर्जावान बनाता है।

नई दिल्ली, 31 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय परंपरा में योगासन, प्राणायम और मुद्राओं का विशेष महत्व दिया गया है। यह शरीर को शारीरिक स्वस्थ्य रखने के साथ-साथ मन को एकाग्र, शांत और संतुलित बनाने में मदद करता है। योग की विभिन्न मुद्राओं में 'महामुद्रा' भी अपना विशेष स्थान रखता है। यह शरीर को स्वस्थ्य रखता है और तंत्रिका तंत्र को संतुलति व ऊर्जावान बनाता है।

'महामुद्रा' हठ योग की एक बेहद महत्वपूर्ण और प्राचीन अभ्यास तकनीक है, जिसे 'महान मुद्रा' भी कहा जाता है। 'महामुद्रा' में 'महा' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है, जिसका अर्थ 'हावभाव', 'मुद्रा', या 'मानसिक स्थिति' बताया गया है। इसलिए, इस मुद्रा को 'महान संकेत' या 'महान मुहर' के नाम से भी जाना जाता है।

योग ग्रंथों में 'महामुद्रा' को 'अमृत का सोपान' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह अभ्यास शरीर के विषैले तत्वों को निकालकर नई ऊर्जा से भर देता है।

आयुष मंत्रालय और योगिक परंपराओं के अनुसार, 'महामुद्रा' एक उन्नत हठयोग अभ्यास है, जो मानसिक शांति, शारीरिक ऊर्जा के संतुलन और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। यह तनाव कम करने और रक्त परिसंचरण में सुधार में सहायक मानी जाती है।

यह इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों के सामंजस्य का प्रतिनिधित्व करता है, जो आध्यात्मिक जागृति की ओर ले जाता है। इस आसन को करने से पाचन तंत्र से जुड़े सभी अंगों पर दबाव पड़ता है, जिससे वे ज्यादा सक्रिय और स्वस्थ होते हैं। साथ ही, यह मेटाबॉलिज्म यानी चयापचय क्रिया को तेज करता है, जिससे खाना अच्छे से पचता है और शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।

यह पेल्विक फ्लोर, रीढ़ की हड्डी और जांघों के पीछे की मांसपेशियों (हैमस्ट्रिंग) को स्ट्रेच और मजबूती बनाती है, जिससे शरीर में लचीलापन और ताकत दोनों बढ़ते हैं। इसके अलावा, डायबिटीज को संतुलित करने में भी मदद करता है। इसके नियमित अभ्यास से शरीर में इंसुलिन बनने की प्रक्रिया संतुलित और ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल रहता है।

हालांकि, इसे हमेशा खाली पेट (प्रातःकाल) करना चाहिए। उच्च रक्तचाप, ग्लूकोमा, गंभीर हर्निया, गर्भावस्था या मासिक धर्म के दौरान इसका अभ्यास न करें। रीढ़ की हड्डी में गंभीर दर्द या समस्या होने पर किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करें।

--आईएएनएस

एनएस/पीएम

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