
डिंडौरी। मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले की घोड़ामाड़ा गुफा प्रागैतिहासिक मानव के इतिहास को लेकर शोध का नया केंद्र बन सकती है। बैगा आदिवासी जिस गुफा को जामवंत गुफा के नाम से भी मानते हैं, वहां विशेष बनावट वाली एक बड़ी खोपड़ी और पैर की हड्डियां मिली हैं। प्रारंभिक अध्ययन के आधार पर इन अवशेषों से करीब 8 से 10 लाख वर्ष पहले इस क्षेत्र में मानव की मौजूदगी की संभावना जताई जा रही है।
पुरातत्व और फॉसिल्स से जुड़े विषयों पर अध्ययन कर रहीं गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. प्रियंका घोष को डिंडौरी भ्रमण के दौरान स्थानीय लोगों ने यह खोपड़ी दिखाई थी। उनके अनुसार, खोपड़ी में वोर्मियन बोन दिखाई देती है। हालांकि, अवशेषों की वास्तविक उम्र और उनकी पहचान की पुष्टि वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद ही हो सकेगी।
खोपड़ी में हड्डियों के जोड़ के बीच छोटी अतिरिक्त हड्डी को वोर्मियन बोन कहा जाता है। यह मानव शरीर रचना की एक दुर्लभ विशेषता है। आज के मनुष्यों में भी यह देखी जा सकती है, लेकिन इसके पाए जाने की संभावना बहुत कम होती है।
डॉ. प्रियंका घोष के अनुसार, डिंडौरी की गुफा से मिली खोपड़ी में वोर्मियन बोन का पैटर्न दिखाई देता है। खोपड़ी के बड़े आकार, बड़े जबड़े और साथ मिली लंबी पैर की हड्डियों ने इस खोज को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
डॉ. घोष के मुताबिक, खोपड़ी और पैर की हड्डियों का फोरेंसिक विशेषज्ञों और एंथ्रोपोलॉजिस्ट से परीक्षण कराया गया है। शोध पत्रों के आधार पर किए गए अध्ययन में इन अवशेषों की बनावट को प्राचीन मानव विकास के दौर से जोड़कर देखा जा रहा है।
प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक, यह मानव 8 से 10 फीट तक लंबा हो सकता था। यह वह काल माना जाता है, जब मानव विकास में होमो इरेक्टस से होमो सेपियंस की ओर संक्रमण हो रहा था।
हालांकि, अवशेषों की सटीक उम्र निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी हैं। अधिकारियों की ओर से कार्बन डेटिंग समेत अन्य परीक्षण कराने की बात कही गई है।
मानव विकास के इतिहास में जावा मैन और पेरू मैन जैसे नामों का उल्लेख मिलता है। इसी क्रम में डॉ. प्रियंका घोष ने डिंडौरी में मिले इन अवशेषों को प्रारंभिक तौर पर ‘डिंडौरी मैन’ नाम दिया है।
डिंडौरी पहले से ही जीवाश्मों की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। यहां डायनासोर और मूंगे के जीवाश्मों के अलावा ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले नीलगिरी जैसे पेड़ों के जीवाश्म भी मिलने की जानकारी सामने आती रही है।
घोड़ामाड़ा गुफा काफी बड़ी और गहरी बताई जाती है। यहां पत्थर से बने हथियार भी मिलने की जानकारी है। इससे संभावना जताई जा रही है कि यह स्थान कभी बड़े मानव समूह के आश्रय स्थल के रूप में इस्तेमाल हुआ होगा।
भूगर्भीय दृष्टि से जबलपुर से डिंडौरी तक का लमेटा क्षेत्र भी महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में घोड़ामाड़ा गुफा से जुड़ी खोज क्षेत्र के प्रागैतिहासिक इतिहास को समझने के लिए अहम हो सकती है।
आयुक्त पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार मदन कुमार नागरगोजे के मुताबिक, राज्य संग्रहालय में घोड़ामाड़ा गुफा से मिली सामग्री के लिए एक विशेष गैलरी बनाने की योजना है।
गैलरी में ऑडियो-विजुअल रिक्रिएशन भी किया जाएगा। खोपड़ी की उम्र और वास्तविक पहचान का पता लगाने के लिए कार्बन डेटिंग सहित अन्य वैज्ञानिक परीक्षण कराए जाएंगे।
इन परीक्षणों के बाद एंथ्रोपोलॉजिस्ट, डॉक्टर और अन्य वैज्ञानिकों के लिए आगे शोध के नए रास्ते खुल सकते हैं। यदि प्रारंभिक अनुमान वैज्ञानिक जांच में सही साबित होते हैं, तो घोड़ामाड़ा गुफा मानव विकास के इतिहास में मध्य प्रदेश की भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्थल बन सकती है।
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