
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 2010 के बहुचर्चित ताड़मेटला नक्सली हमले के मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने इस हमले के सभी 10 आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। यह हमला देश के सबसे घातक नक्सली हमलों में से एक था, जिसमें सीआरपीएफ के 75 जवानों समेत कुल 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपियों की रिहाई को चुनौती दी गई थी।
अदालत ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गहरा दुख व्यक्त किया। कोर्ट ने उन प्रमुख कारणों का उल्लेख किया जिनके कारण इतने बड़े हमले के आरोपियों को दोषी साबित नहीं किया जा सका:
प्रत्यक्ष प्रमाण का अभाव: मामले में कोई भी ऐसा चश्मदीद गवाह पेश नहीं किया जा सका जिसने आरोपियों की पहचान हमले के दोषियों के रूप में की हो।
इकबालिया बयान की विफलता: अभियोजन पक्ष ने धारा 164 के तहत दर्ज जिस इकबालिया बयान को मुख्य आधार बनाया था, उसे स्वतंत्र साक्ष्यों द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सका।
बरामदगी पर सवाल: घटनास्थल से बरामद हथियार और विस्फोटक सामग्री आरोपियों के कब्जे से नहीं मिली थी, जिससे उनकी संलिप्तता सिद्ध नहीं हो पाई।
पहचान परेड (TIP) की कमी: जांच के दौरान आरोपियों की कोई शिनाख्त परेड नहीं कराई गई, जो किसी भी आपराधिक मामले में पहचान का एक महत्वपूर्ण कानूनी हिस्सा होता है।
प्रक्रियात्मक खामियां: अदालत ने नोट किया कि आर्म्स एक्ट के तहत आवश्यक मंजूरी के रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए और एफएसएल (FSL) रिपोर्ट भी अदालत के सामने सही ढंग से प्रस्तुत नहीं की गई।
उच्च न्यायालय ने फैसले के दौरान बेहद कड़ी टिप्पणी की। पीठ ने कहा, "यह अत्यंत दुखद है कि 76 जवानों की शहादत और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इतने संवेदनशील मामले में भी एजेंसियां कानूनी रूप से मान्य सबूत पेश नहीं कर सकीं।" कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसे गंभीर मामलों की जांच के लिए उच्च मानक और बेहतर प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए।
Leave A Reviews