ढाका, 25 अगस्त (आईएएनएस)। बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने जुलाई आंदोलन से जुड़े केस में तीन पत्रकारों को जेल भेज दिया। कोर्ट ने तीनों को औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाकर जेल भेजने का आदेश दिया।
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ढाका, 25 अगस्त (आईएएनएस)। बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने जुलाई आंदोलन से जुड़े केस में तीन पत्रकारों को जेल भेज दिया। कोर्ट ने तीनों को औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाकर जेल भेजने का आदेश दिया।
इन तीन बांग्लादेशी पत्रकारों में 'भोरर कागोज' के पूर्व संपादक श्यामला दत्ता, 'एकात्तोर टीवी' के मैनेजिंग डायरेक्टर और एडिटर-इन-चीफ मोजम्मेल बाबू और उनकी मुख्य संवाददाता फरजाना रूपा शामिल हैं।
बांग्लादेश के प्रमुख अखबार 'द डेली स्टार' की रिपोर्ट के मुताबिक, जेल अधिकारियों ने सोमवार को इन तीनों को ट्रिब्यूनल के सामने पेश किया; ये तीनों पहले से ही हिरासत में थे।
अभियोजक गाजी मोनाववर हुसैन तमीम ने आरोप लगाया कि 14 जुलाई, 2024 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोपियों के भड़काऊ बयानों के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने "रजाकार" वाली टिप्पणी की थी, जिससे बाद में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
बाबू और रूपा पर मानवता के विरुद्ध अपराध के एक अलग मामले में भी मुकदमा चल रहा है। यह मामला 2013 में मोटिज्हील के शापला चत्तर और नारायणगंज में हेफाजत-ए-इस्लाम की रैली पर की गई कार्रवाई से जुड़ा है।
जुलाई 2024 के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मानवता के खिलाफ अपराध मामले में, आईसीटी (अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण) ने पिछले हफ्ते जेल अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे सोमवार को तीनों पत्रकारों को ट्रिब्यूनल के सामने पेश करें। इस कदम की दुनिया भर में कड़ी निंदा हुई।
इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताते हुए, फ्रांस स्थित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन 'जस्टिस मेकर्स बांग्लादेश इन फ्रांस' (जेएमबीएफ) ने कहा कि पत्रकारों की बातचीत, सवाल-जवाब, टिप्पणी, संपादकीय रुख या राजनीतिक नैरेटिव पर "मानवता के खिलाफ अपराध" जैसा बेहद गंभीर आरोप लगाने की कोशिश "बेहद चिंताजनक" है।
मानवाधिकार समूह ने कहा कि ऐसे आरोपों के समर्थन में विश्वसनीय और ठोस सबूत होने चाहिए जो ऐसे आचरण को साबित करें जो लागू आपराधिक कानून और अंतरराष्ट्रीय मानकों की सख्त शर्तों को पूरा करते हों।
जेएमबीएफ ने कहा, "पत्रकारिता कोई अपराध नहीं है। राजनीतिक असहमति कोई अपराध नहीं है। आलोचना, सवाल-जवाब, टिप्पणी और यहां तक कि विवादास्पद या अलोकप्रिय विचारों को केवल इसलिए 'मानवता के खिलाफ अपराध' नहीं माना जा सकता क्योंकि वे विचार बाद में राजनीतिक रूप से आपत्तिजनक हो जाते हैं।"
जेएमबीएफ के संस्थापक अध्यक्ष शाहनूर इस्लाम ने कहा कि मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली पिछली अंतरिम सरकार के दौरान देखी गई कार्यप्रणाली के बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार के तहत पत्रकारों के खिलाफ मानवता के खिलाफ अपराध की कार्यवाही शुरू करना आपराधिक न्याय प्रणाली के "राजनीतिक प्रतिशोध और डराने-धमकाने" के हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा करता है।
उन्होंने कहा, "ऐसी कार्यप्रणाली बेहद परेशान करने वाली, लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ और पूरी तरह से अस्वीकार्य है।"
पिछले हफ्ते ही, प्रेस की आजादी के लिए काम करने वाले ग्लोबल ग्रुप 'कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स' (सीपीजे) ने बांग्लादेशी अधिकारियों से कहा था कि वे तीन पत्रकारों को 'मानवता के विरुद्ध अपराध' का नया केस वापस लें और न्यूज रिपोर्टिंग को 'अपराध' का दर्जा देना बंद करें।
सीपीजे के एशिया-पैसिफिक प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर कुणाल मजूमदार ने कहा, "सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने के लिए पत्रकार श्यामला दत्ता, मोजम्मेल बाबू और फरजाना रूपा पर 'मानवता के विरुद्ध अपराध' केस शुरू करना चौंकाने वाला और बहुत चिंताजनक है।"
--आईएएनएस
केआर/
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