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भव्य सेट और महिलाओं का दबदबा, क्यों संजय लीला की फिल्मों में दिखते हैं ये दो खास फैक्टर्स

मुंबई, 23 फरवरी (आईएएनएस)। बॉलीवुड के मशहूर फिल्मकार संजय लीला भंसाली की 'हम दिल दे चुके सनम', 'देवदास', 'बाजीराव मस्तानी' और 'हीरामंडी' जैसी फिल्मों की चर्चा बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से लेकर किरदारों के संवादों पर हुई।

मुंबई, 23 फरवरी (आईएएनएस)। बॉलीवुड के मशहूर फिल्मकार संजय लीला भंसाली की 'हम दिल दे चुके सनम', 'देवदास', 'बाजीराव मस्तानी' और 'हीरामंडी' जैसी फिल्मों की चर्चा बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से लेकर किरदारों के संवादों पर हुई।

24 फरवरी को जन्मे संजय लीला भंसाली की फिल्में बड़े पैमाने पर क्लासिक और पीरियड ड्रामा की कहानियों को पर्दे पर दिखाती हैं, वहीं फिल्म के भव्य सेट भी दर्शकों को इतिहास के सुनहरे पलों में वापस ले जाने में भी सक्षम होते हैं। निर्माता की फिल्म का हर सेट अद्भुत होता है, जिसमें कला, इतिहास और संस्कृति तीनों का मेल देखने को मिलता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि क्यों हमेशा भंसाली की फिल्मों के सेट बॉलीवुड की एक फिल्म के बजट के बराबर होते हैं?

'देवदास' बनाने वाले भंसाली ने सेट पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए थे। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो चंद्रमुखी का कोठा और पारो का महल बनाने में 15 करोड़ रुपए का खर्चा हुआ था। इतना ही नहीं, फिल्मों के लिए सिर्फ ऐश्वर्या राय के लिए भंसाली ने 600 साड़ियां डिजाइन करवाई थीं। गौर करने वाली बात यह भी है कि भंसाली की फिल्मों में हमेशा फीमेल लीड को सशक्त दिखाया है, चाहे वे चंद्रमुखी, पारो, लीला या फिर हीरामंडी की सोनाक्षी सिन्हा ही क्यों न हों। इसके पीछे भी बहुत बड़ी वजह है।

निर्माता-निर्देशक ने हमेशा अपनी मां को संघर्ष भरी जिंदगी जीते हुए देखा। अपने दोनों बच्चों को पालने के लिए लीला भंसाली कपड़े सिलती थी, साड़ियों पर फॉल लगाती थी और जरूरत पड़ने पर छोटे मंच पर डांस भी करती थी, लेकिन चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। यह मुस्कान भंसाली की हिम्मत बनी और उन्होंने ठान लिया कि उनकी हर फिल्म में अभिनेत्री बड़े और भव्य मंच पर डांस करेगी और महिलाओं के लिए उनकी फिल्मों और किरदारों में हमेशा वही हिम्मत और मजबूती झलकेगी, जो उन्होंने अपनी मां में देखी थी।

एक इंटरव्यू में फिल्म देवदास का जिक्र करते हुए भंसाली ने कहा था कि फिल्म में उन्होंने ऐश्वर्या और माधुरी की मां दुर्गा के रूप में कल्पना की थी और मेरे लिए महिलाओं से बड़ी कोई शक्ति नहीं है। शायद यही वजह रही कि भंसाली की लगभग सभी फिल्मों में मर्दों को भावनात्मक रूप से टूटा हुआ दिखाया गया है, लेकिन महिलाओं को सशक्त और शक्ति का रूप दिखाया गया है। बात चाहे पद्मावती की हो या रामलीला की, दोनों की फिल्मों में फीमेल किरदार का दबदबा ज्यादा रहा है।

वहीं भंसाली राज कपूर के बहुत बड़े फैन हैं। वे जब भी फिल्में बनाते हैं तो राज कपूर को हमेशा अपने दिमाग में रखते हैं। उनसे प्रभावित होकर ही भंसाली ने फिल्मों का निर्देशन करने का फैसला लिया था।

--आईएएनएस

पीएस/एएस

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