
भोपाल। शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा दिलाने की मुहिम को मध्य प्रदेश में बड़ा झटका लगा है। राजधानी भोपाल के 40 नामी स्कूलों सहित प्रदेश भर के लगभग 1200 निजी स्कूलों में आरटीई कोटे के तहत पहले चरण में एक भी छात्र का नामांकन नहीं हो सका है। राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा जारी आंकड़ों ने शिक्षा व्यवस्था और जमीनी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक निजी स्कूल को अपनी शुरुआती कक्षा की 25% सीटें गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रखनी अनिवार्य हैं। 15 अप्रैल को समाप्त हुए नामांकन के पहले चरण में स्थिति बेहद चिंताजनक रही। भोपाल के जिन 40 स्कूलों में 'जीरो एडमिशन' दर्ज किया गया है, उनमें सीबीएसई और एमपी बोर्ड से संबद्ध कई प्रतिष्ठित संस्थान शामिल हैं।
पूरे प्रदेश की बात करें तो कुल 1200 से अधिक स्कूल 25% कोटे की अनिवार्य शर्त को पूरा करने में विफल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, पहले चरण की लॉटरी में राज्य भर के 1 लाख 6 हजार 51 बच्चों को सीटें आवंटित की गई थीं, जिनमें 54,746 लड़के और 51,305 लड़कियां शामिल थीं। हालांकि, आवंटन के बावजूद बड़ी संख्या में अभिभावक दस्तावेज सत्यापन और स्कूल में रिपोर्टिंग के लिए नहीं पहुंचे।
पहले चरण की विफलता और खाली रह गई सीटों को भरने के लिए शिक्षा विभाग अब दूसरे चरण की तैयारी कर रहा है। विभाग के अनुसार, 20 अप्रैल 2026 के बाद आरटीई प्रवेश का दूसरा दौर शुरू होगा। जिन बच्चों का नाम पहले चरण में नहीं आ पाया था या जो किसी कारणवश पसंदीदा स्कूल में आवेदन नहीं कर सके थे, उनके लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर होगा।
दूसरे चरण की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन होगी। आवेदक आधिकारिक पोर्टल पर जाकर स्कूलों में रिक्त सीटों की सूची देख सकेंगे और अपनी पसंद के विकल्प अपडेट कर सकेंगे। सरकार का लक्ष्य है कि कोई भी पात्र बच्चा शिक्षा के अधिकार से वंचित न रहे और निजी स्कूलों की आरक्षित सीटें रिक्त न जाएं।
नामांकन शून्य होने पर स्कूल प्रबंधन इसे 'नो-शो' यानी अभिभावकों की अनुपस्थिति बता रहे हैं। उनका तर्क है कि लॉटरी में नाम आने के बाद भी संबंधित परिवार संपर्क करने नहीं आए। वहीं, दूसरी ओर शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि यदि कोई स्कूल जानबूझकर प्रवेश प्रक्रिया में बाधा डालेगा या गरीब बच्चों को दाखिला देने से मना करेगा, तो उसकी मान्यता रद्द करने जैसी सख्त कार्रवाई की जाएगी।
शहरी इलाकों में आरटीई के प्रति बढ़ती उदासीनता को देखते हुए शिक्षा कार्यकर्ता अब विशेष हेल्पलाइन और जागरूकता अभियान की मांग कर रहे हैं। राज्य सरकार अब इस बात पर नजर रख रही है कि दूसरे चरण में ये बड़े स्कूल अपनी सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी का निर्वहन कैसे करते हैं।
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