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सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में मिला बाघ का शव, रेडियो कॉलर जलाकर किया नष्ट, शिकार की आशंका


पचमढ़ी: मध्य प्रदेश के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व (STR) में बाघों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शनिवार को पचमढ़ी पूर्व रेंज के डहालिया-मुआर क्षेत्र में एक बाघ का शव मिलने से हड़कंप मच गया है। हालांकि अधिकारी इसे प्रारंभिक तौर पर सामान्य मौत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मौके के हालात और पूर्व की घटनाओं को देखते हुए बाघ के शिकार की प्रबल आशंका जताई जा रही है। सूचना मिलते ही एसटीआर प्रबंधन की टीम मौके के लिए रवाना हो गई है, लेकिन दुर्गम इलाका होने के कारण विस्तृत जानकारी की प्रतीक्षा की जा रही है।

अधिकारियों के बयानों और धरातल में अंतर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के जनसंपर्क अधिकारी आशीष खोपरागड़े के अनुसार, पचमढ़ी क्षेत्र में 'शेड्यूल 1' के वन्यप्राणी (संभवतः बाघ) की मौत हुई है। उन्होंने बताया कि टीम मौके पर है, लेकिन जंगल के अंदर नेटवर्क की समस्या के कारण सही स्थिति टीम के बाहर आने पर ही स्पष्ट हो पाएगी। गौर करने वाली बात यह है कि एसटीआर प्रबंधन अक्सर बाघों की मौत को शुरुआत में 'आपसी संघर्ष' या 'सामान्य मौत' करार देता है, लेकिन जांच के बाद कई बार शिकार के मामले उजागर हुए हैं। हाल ही में छिंदवाड़ा सीमा पर हुई बाघ की मौत इसका ताजा उदाहरण है।

सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल: पहले भी हो चुके हैं शिकार टाइगर रिजर्व में बाघों की मॉनिटरिंग और सुरक्षा में भारी लापरवाही सामने आ रही है। अगस्त 2025 में प्रसिद्ध बाघ 'रावण' का शिकार हुआ था, जिसके पंजे काटकर शिकारी ले गए थे और उसका शव तवा नदी में मिला था। उस घटना के मुख्य आरोपी आज भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। इतना ही नहीं, जनवरी 2026 में सोनतलाई बीट में बाघिन की संदिग्ध मौत और मार्च में रेडियो कॉलर जलाकर बाघ का शिकार करने की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि शिकारी जंगल के अंदर तक सक्रिय हैं।

लापरवाही का लंबा सिलसिला एसटीआर प्रबंधन पर आरोप लग रहे हैं कि वे बाघों की 'रियल टाइम मॉनिटरिंग' करने में विफल रहे हैं। मई 2025 में बंदूकधारी शिकारियों द्वारा सांभर का शिकार करना और सितंबर 2025 में कैमरों की चोरी जैसी घटनाओं के बावजूद प्रबंधन ने कोई ठोस सुरक्षा कदम नहीं उठाए। प्रबंधन की इसी ढील का नतीजा है कि आए दिन कभी आपसी संघर्ष तो कभी संदिग्ध परिस्थितियों में बाघ अपनी जान गंवा रहे हैं। बाघों की घटती संख्या और शिकारियों की बेखौफ आवाजाही ने अब वन विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

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