
नई दिल्ली: देश की चुनाव प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की फिंगरप्रिंट और आईरिस (आंखों की पुतली) आधारित बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई: यह याचिका भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि फर्जी मतदान, डुप्लीकेट वोटिंग और 'घोस्ट वोटिंग' जैसी समस्याओं को रोकने के लिए बायोमेट्रिक और फेस रिकग्निशन (चेहरा पहचान) तकनीक अनिवार्य की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता का मानना है कि वर्तमान व्यवस्था में रिश्वत और अनुचित प्रभाव जैसी चुनौतियां चुनाव की पवित्रता को प्रभावित करती हैं।
आगामी चुनावों में लागू करना संभव नहीं: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था को वर्तमान या आगामी चुनावों में तुरंत लागू करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी प्रणाली को धरातल पर उतारने के लिए नियमों में व्यापक बदलाव करने होंगे और इससे सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ भी पड़ेगा। हालांकि, पीठ ने भविष्य के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए इस पर विचार करने की आवश्यकता पर सहमति जताई।
चुनाव आयोग और राज्यों का रुख होगा अहम: शुरुआत में अदालत नोटिस जारी करने के पक्ष में नहीं थी और याचिकाकर्ता को चुनाव आयोग के पास जाने की सलाह दी थी। लेकिन बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया। पीठ ने कहा कि पहले चुनाव आयोग इस पर अपना रुख स्पष्ट करे। साथ ही, राज्यों का सहयोग और वित्त मंत्रालय द्वारा बजट की मंजूरी इस परियोजना की सफलता के लिए अनिवार्य होगी।
सुप्रीम कोर्ट अब केंद्र, चुनाव आयोग और राज्यों के जवाब मिलने के बाद इस मामले की अगली सुनवाई करेगा। यह मामला भविष्य में भारतीय चुनाव प्रणाली के तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
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