
पन्ना और छतरपुर जिलों में केन-बेतवा लिंक परियोजना और अन्य विकास योजनाओं से प्रभावित परिवारों के उचित मुआवजे, विस्थापन और पुनर्वास के अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहीं 25 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता दिव्या अहिरवार को शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से नियमित जमानत मिल गई है। जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकल पीठ ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए पन्ना पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी और दर्ज मुकदमे की वैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों पर की गई पुलिसिया कार्रवाई प्रथम दृष्टया संदेह के घेरे में है।
दिव्या अहिरवार को 28 सितंबर को धारा 307 (हत्या के प्रयास) सहित कई संगीन धाराओं के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। लगभग 35 दिनों तक जेल में रहने के बाद मिली इस राहत को विस्थापितों और आंदोलनकारी ग्रामीणों की बड़ी नैतिक जीत माना जा रहा है।
दिव्या अहिरवार अपने सहयोगी अमित भटनागर के साथ मिलकर केन-बेतवा लिंक और बांध परियोजनाओं के कारण उजड़ रहे सैकड़ों परिवारों के हक के लिए लंबे समय से जमीन पर संघर्ष कर रही हैं। मझगांय डैम क्षेत्र में उनके नेतृत्व में ग्रामीणों और सैकड़ों महिलाओं ने अनूठे विरोध प्रदर्शन किए, जिनमें 'चिता सत्याग्रह', 'फांसी आंदोलन' और नदी के पानी में खड़े होकर किया गया 'जल सत्याग्रह' शामिल था।
आंदोलन के दौरान महिलाएं हाथों में तख्तियां लेकर "न्याय दो या फिर मार दो" जैसे नारों के साथ अपना आक्रोश दर्ज करा रही थीं। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के व्यापक जनसमर्थन में बदलने के बाद जिला प्रशासन ने सख्ती दिखानी शुरू की थी। आंदोलनकारी अधिवक्ता अंजना कुरारिया के अनुसार, 28 से 30 सितंबर के दौरान पन्ना में भारी पुलिस बल और सीआरपीएफ की तैनाती कर आंदोलनकारियों पर दमनकारी कार्रवाई की गई थी। 28 सितंबर की रात पुलिस ने दिव्या अहिरवार के साथ हिसाबी राजपूत, इंद्रपाल और कमलेश प्रजापति को हिरासत में लिया था। अन्य तीन साथियों को 12 अक्टूबर को ही छतरपुर कोर्ट से जमानत मिल गई थी, जबकि दिव्या की रिहाई अब हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद संभव हो सकी।
दिव्या की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन थमा नहीं, बल्कि पूर्व राज्यसभा सांसद और माकपा नेता वृंदा करात ने मौके पर पहुंचकर आंदोलन की कमान संभाली थी। इसके अलावा मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया और आम आदमी पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष रानी अग्रवाल सहित कई प्रमुख नेताओं ने पन्ना पहुंचकर आंदोलन को अपना खुला समर्थन दिया था।
विपक्ष ने आरोप लगाया था कि आदिवासियों, किसानों और वंचितों को बिना समुचित पुनर्वास और मुआवजा दिए उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है और आवाज उठाने वाली युवा महिलाओं पर हत्या के प्रयास जैसी फर्जी धाराएं लगाकर लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचला जा रहा है। हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद अब स्थानीय पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर प्रशासनिक स्तर पर भी जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है।
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