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पन्ना, 250 रुपए पट्टे से मिला 82 लाख का हीरा, आदिवासी की किस्मत बदली


पन्ना। मजदूर दिवस पर एक ऐसी कहानी सामने आई है जो हर गरीब के लिए प्रेरणा बन सकती है। 60 साल के चुनुवाद आदिवासी ने महज 250 रुपए के पट्टे पर हीरे की खदान ली और उन्हें 19.22 कैरेट का जैम्स क्वालिटी हीरा मिल गया। नीलामी के बाद उनके खाते में करीब 82 लाख रुपए आए, जिससे उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई।

'ये तो हीरा है, जिसकी मुझे तलाश थी'

चुनुवाद भावुक होते हुए कहते हैं, "मुझे अच्छे से याद है। उस दिन बुधवार, 24 जुलाई 2024 थी। दोपहर होने जा रही थी। मैं खदान में पत्थर छान रहा था, तभी कंकड़ों में कुछ कांच के टुकड़े जैसा दिखा। मैंने कांपते हाथों से उसे उठाया। आंखों के पास लाकर हल्की चमक देखी। अंदर से आवाज आई — ये तो हीरा है, जिसकी मुझे तलाश थी।"

झोपड़ी से पक्के मकान तक का सफर

हीरा मिलने से पहले चुनुवाद की जिंदगी काफी कठिन थी। पत्नी सावित्री बाई बताती हैं, "हम लोगों की जिंदगी झोपड़ी में ही गुजर गई। दूसरों के खेतों की रखवाली करते थे। मजदूरी का अनाज इतने बड़े परिवार के लिए कम पड़ जाता था। कई दिन सब्जी के पैसे नहीं होते थे। परिवार नमक-रोटी खाकर सो जाता था।" चार बेटियों की शादी और घर खर्च से परिवार लाखों के कर्ज में डूब गया था।

कैसे मिला हीरा?

पन्ना में कई मजदूर 250 रुपए के पट्टे पर हीरे की खदान लेते हैं। जनवरी 2024 में चुनुवाद और उनके बेटों ने भी किस्मत आजमाने का फैसला किया। कृष्णा कल्याणपुर पटी क्षेत्र में हीरे की तलाश शुरू हुई। जब भी समय मिलता, पूरा परिवार खुदाई करता, मिट्टी धोकर पत्थर निकालता और एक-एक पत्थर को बारीकी से देखता।

19.22 कैरेट का जैम्स क्वालिटी हीरा

24 जुलाई 2024 को चुनुवाद को एक बड़ा चमकता पत्थर मिला। हीरा कार्यालय में पारखी ने बताया कि यह 19.22 कैरेट का जैम्स क्वालिटी का हीरा है। यह सुनते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। 11 नवंबर 2024 को नीलामी हुई और हीरा 93 लाख रुपए में बिका। 12% रॉयल्टी कटने के बाद करीब 82 लाख रुपए उनके खाते में आए। मोबाइल पर क्रेडिट मैसेज आते ही परिवार की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

अब कैसी है जिंदगी?

चुनुवाद ने हीरे के पैसों का समझदारी से उपयोग किया:
  • 6 लाख रुपए में प्लॉट खरीदा
  • 9 लाख रुपए में पक्का मकान बनवाया
  • ट्रैक्टर-ट्रॉली और खेती के उपकरण खरीदे
  • स्कूटी ले रखी है देखरेख के लिए
अब वे मजदूरी छोड़कर खेतों में ठेकेदारी करते हैं। इस साल उनकी खेत में 60 क्विंटल गेहूं की बंपर पैदावार हुई है। बड़े बेटे राजू कहते हैं, "हीरे का पैसा मिलते ही कर्ज चुकाया। छह बेटियां हैं, उन्हें अच्छा पढ़ाना है। पहले कोई पूछता नहीं था, अब वक्त बदल गया है।" परिवार अब 5 एकड़ जमीन खरीदने की योजना बना रहा है।
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