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गोवा क्रांति दिवस : जब गोवा ने तय किया अपना भाग्य, हिल गई पुर्तगाली साम्राज्य की नींव


पणजी, 17 जून (आईएएनएस)। साल था 1946 और तारीख थी 18 जून... मडगांव का चौक खचाखच भीड़ से भरा था। यह जनसैलाब उस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने आया था जब गोवा पहली बार संगठित होकर अपने अधिकारों और स्वतंत्रता की मांग कर रहा था। इसी दिन गोवावासियों ने यह तय कर लिया कि अब उनके भाग्य का फैसला कोई औपनिवेशिक सत्ता नहीं बल्कि वे स्वयं करेंगे। यही वजह है कि 18 जून को गोवा क्रांति दिवस के रूप में याद किया जाता है।

पणजी, 17 जून (आईएएनएस)। साल था 1946 और तारीख थी 18 जून... मडगांव का चौक खचाखच भीड़ से भरा था। यह जनसैलाब उस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने आया था जब गोवा पहली बार संगठित होकर अपने अधिकारों और स्वतंत्रता की मांग कर रहा था। इसी दिन गोवावासियों ने यह तय कर लिया कि अब उनके भाग्य का फैसला कोई औपनिवेशिक सत्ता नहीं बल्कि वे स्वयं करेंगे। यही वजह है कि 18 जून को गोवा क्रांति दिवस के रूप में याद किया जाता है।

हालांकि, इस क्रांति की कहानी मडगांव के उस चौक से नहीं बल्कि हजारों किलोमीटर दूर जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय से शुरू होती है। 1920 के दशक के उत्तरार्ध में वहां दो युवा छात्र मिले, गोवा के जूलियाओ मेनेजेस और उत्तर प्रदेश के अकबरपुर निवासी राममनोहर लोहिया। दोनों के भीतर राष्ट्रवाद की समान भावना थी और दोनों एक ऐसे भारत का सपना देखते थे, जो विदेशी शासन से मुक्त हो। शिक्षा पूरी करने के बाद दोनों अपने-अपने रास्तों पर लौटे लेकिन लक्ष्य एक ही रहा।

लोहिया 1933 में पीएचडी पूरी कर भारत लौट आए जबकि मेनेजेस ने एमडी की डिग्री हासिल कर 1938 में गोवा वापसी की। बाद में वे बंबई चले गए और वहीं से गोवा में नागरिक अधिकारों की आवाज बुलंद करने लगे। दोनों मित्र लगातार संपर्क में रहे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब लोहिया भूमिगत थे, तब मेनेजेस ने उन्हें अपने यहां शरण भी दी। 1946 में जब लोहिया अस्वस्थ हुए तो मेनेजेस ने उन्हें दक्षिण गोवा के असोलना गांव स्थित अपने घर में आराम करने का निमंत्रण दिया लेकिन गोवा पहुंचने के बाद विश्राम की जगह विचार-विमर्श शुरू हो गया। 10 जून से ही बुद्धिजीवियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आना-जाना शुरू हो गया। चर्चा का केंद्र था, गोवा के लोगों को नागरिक अधिकार कैसे दिलाए जाएं।

यहीं से एक नए आंदोलन का जन्म हुआ। उस दौर में पुर्तगाली शासन ने सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा रखा था। इसके बावजूद 15 जून को मेनेजेस और लोहिया ने पणजी में एक जनसभा को संबोधित किया। यह सीधे-सीधे सविनय अवज्ञा थी। सभा की सफलता ने दोनों नेताओं का उत्साह बढ़ाया और तीन दिन बाद मडगांव में एक और विशाल जनसभा आयोजित करने का निर्णय लिया गया। 18 जून को मडगांव में जो दृश्य सामने आया, उसने पुर्तगाली प्रशासन को पूरी तरह चौंका दिया। भारी भीड़ के बीच मेनेजेस और लोहिया ने लोगों से औपनिवेशिक शासन के खिलाफ खड़े होने और अपने अधिकार वापस लेने का आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि स्वतंत्रता केवल मांगने से नहीं, बल्कि संघर्ष से हासिल होती है।

पुर्तगाली सरकार ने शुरू में इस जनआंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया। उसने इसे खारिज करने की कोशिश की। लेकिन, जब जन समर्थन बढ़ता गया तो प्रशासन की चिंता बढ़ गई। सभा के तुरंत बाद मेनेजेस और लोहिया को गिरफ्तार कर लिया गया और अंधेरे में पणजी पुलिस स्टेशन ले जाया गया। हालांकि गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। देखते ही देखते आंदोलन और तेज हो गया। अगले ही दिन जैसे-जैसे यह खबर फैली, पूरे गोवा में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। शहरों और कस्बों की सड़कों पर लोग उतर आए। जगह-जगह धरने दिए गए और दोनों क्रांतिकारियों को छोड़ने की मांग होने लगी।

बाद में लोहिया को गोवा सीमा तक ले जाकर रिहा कर दिया गया, जबकि मेनेजेस को मडगांव में छोड़ा गया। लेकिन तब तक इतिहास करवट ले चुका था। दोनों नेताओं ने जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, उसने गोवा में स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दे दी। भारत ने 1947 में ब्रिटिश शासन से आजादी प्राप्त कर ली, लेकिन गोवा को अभी भी पुर्तगाली शासन के अधीन रहना पड़ा। दरअसल, पुर्तगालियों की मौजूदगी भारत में उस दौर से थी जब वास्कोडिगामा 1498 में समुद्री मार्ग से यहां पहुंचा था। समय के साथ उनका प्रभाव सिमटता गया, लेकिन गोवा उनके सबसे महत्वपूर्ण ठिकानों में बना रहा।

करीब साढ़े चार शताब्दियों तक पुर्तगाली शासन झेलने के बाद अंततः 19 दिसंबर 1961 को गोवा को आजादी मिली। भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय के जरिए गोवा, दमन और दीव को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया। भारत इसे गोवा की मुक्ति के रूप में देखता है, जबकि पुर्तगाली पक्ष इसे गोवा पर आक्रमण कहता है।

--आईएएनएस

पीआईएम/पीएम

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