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गुजरात में साइबर ठगी गिरोह को बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले दो आरोपी गिरफ्तार


गांधीनगर, 2 सितंबर (आईएएनएस)। गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने मेहसाणा जिले से दो लोगों को गिरफ्तार किया है। इन पर आरोप है कि वे साइबर ठगी करने वाले गिरोह को बल्क मोड सुविधा वाले कॉर्पोरेट बैंक खाते उपलब्ध करा रहे थे।

गांधीनगर, 2 सितंबर (आईएएनएस)। गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने मेहसाणा जिले से दो लोगों को गिरफ्तार किया है। इन पर आरोप है कि वे साइबर ठगी करने वाले गिरोह को बल्क मोड सुविधा वाले कॉर्पोरेट बैंक खाते उपलब्ध करा रहे थे।

जांच में पता चला है कि इन खातों का इस्तेमाल कई राज्यों में हुई साइबर ठगी के मामलों में किया गया, जिनमें करीब 1.5 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी हुई है। यह गिरफ्तारी 'ऑपरेशन म्यूल हंट 2.0' के तहत की गई।

इस मामले में भारतीय न्याय संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान पार्थ बारोट और रमेश कुमार लवाणा के रूप में हुई है। दोनों मेहसाणा जिले के विसनगर क्षेत्र के रहने वाले हैं।

पुलिस ने दोनों को विसनगर से पकड़ा और कानूनी प्रक्रिया के बाद औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया। साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के अनुसार, इस मामले में अब तक छह अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं, गिरोह से जुड़े बाकी लोगों की तलाश जारी है।

जांच एजेंसियों का कहना है कि बारोट और लवाणा लोगों से बैंक खाते हासिल करके साइबर ठगी गिरोह तक पहुंचाते थे। गिरोह खासतौर पर उन खातों की मांग करता था, जिनमें बल्क मोड सुविधा होती है। इस सुविधा के जरिए एक साथ कई लेनदेन या भुगतान किए जा सकते हैं। यह आमतौर पर व्यावसायिक, कॉर्पोरेट, सरकारी या संस्थागत खातों में उपलब्ध होती है, न कि सामान्य बचत खातों में।

पुलिस के मुताबिक आरोपी ऐसे खाताधारकों को कमीशन का लालच देते थे। इसके बदले वे उनसे आधार कार्ड, पैन कार्ड, चेकबुक की तस्वीरें, एटीएम कार्ड के आगे और पीछे की फोटो, इंटरनेट बैंकिंग आईडी और पासवर्ड जैसी जानकारियां हासिल कर लेते थे।

इसके बाद यह सारी जानकारी साइबर ठगी गिरोह को सौंप दी जाती थी। आरोपी यह भी जांचते थे कि इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी सही है या नहीं और उससे लॉगिन किया जा सकता है या नहीं।

पुलिस के अनुसार खाताधारकों को मोबाइल में ऐपीके फाइल इंस्टॉल करने के लिए भी राजी किया जाता था, ताकि गिरोह को लेनदेन के लिए आने वाले ओटीपी की जरूरत न पड़े।

--आईएएनएस

एएमटी/एबीएम

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