
इंदौर स्थित भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल के कारण हुई दर्दनाक मौतों के बहुचर्चित मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (इंदौर खंडपीठ) के आदेश के बाद आधिकारिक जांच रिपोर्ट को हाईकोर्ट की अधिकृत वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दिया गया है। करीब 600 पन्नों की इस विस्तृत जांच रिपोर्ट ने स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की पिछले 30 वर्षों की व्यवस्थागत लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता को बेनकाब कर दिया है। रिपोर्ट के निष्कर्षों के अनुसार, यह त्रासदी किसी एक व्यक्ति की भूल का परिणाम नहीं, बल्कि करीब तीन दशकों से सीवरेज और जलापूर्ति प्रणाली में जमी खामियों का नतीजा थी।
भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से कई नागरिकों की असामयिक मौत और सैकड़ों लोगों के गंभीर रूप से बीमार होने के बाद हाईकोर्ट ने एक स्वतंत्र जांच समिति गठित की थी। जांच समिति ने घटना के तकनीकी, प्रशासनिक और बुनियादी ढांचागत कारणों की गहन पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर दी थी, परंतु इसे लंबे समय तक सार्वजनिक नहीं किया गया था।
जांच रिपोर्ट को आम जनता के समक्ष पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से एडवोकेट रितेश ईरानी ने इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के उपरांत मामले की संवेदनशीलता और जनहित को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश जारी किए।
एडवोकेट रितेश ईरानी द्वारा साझा की गई प्राथमिक जानकारी के अनुसार, जांच रिपोर्ट में इस मानवीय त्रासदी के पीछे दो सबसे गंभीर तकनीकी और प्रशासनिक लापरवाहियों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है:
पेयजल और सीवर लाइन का समानांतर होना: रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र में मुख्य पेयजल आपूर्ति पाइपलाइन और सीवरेज लाइन बिल्कुल समानांतर (एक साथ) बिछाई गई थीं। समय के साथ जब दोनों पाइपलाइनों में लीकेज हुआ, तो सीवर का गंदा व जहरीला पानी सीधे पेयजल लाइन में मिल गया। इसके कारण नलों से दूषित पानी घरों तक पहुंचा और लोगों की जान गई।
टेंडर जारी होने के बाद भी नहीं बदली पाइपलाइन: जांच में सामने आया कि क्षेत्र में दशकों पुरानी और जर्जर पाइपलाइन को बदलने के लिए प्रक्रिया तो शुरू की गई थी और टेंडर भी जारी किए गए थे, लेकिन नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों ने फाइलों को आगे नहीं बढ़ाया और धरातल पर पाइपलाइन बदलने का कोई ठोस कार्य नहीं किया गया।
जांच रिपोर्ट यह साफ करती है कि भागीरथपुरा में बुनियादी ढांचे का विस्तार बिना किसी भविष्यगामी योजना के अनियोजित तरीके से किया जाता रहा। 600 पन्नों के इस दस्तावेज में नगर निगम के स्वास्थ्य, जलकार्य और सीवरेज विभाग के तत्कालीन अधिकारियों व कर्मचारियों की जवाबदेही पर भी विस्तृत बिंदु दर्ज हैं।
याचिकाकर्ता एडवोकेट रितेश ईरानी के अनुसार, रिपोर्ट के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े तथ्यों का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है, जिनका खुलासा आगामी दिनों में कानूनी मंच पर किया जाएगा।
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